Monday, December 8, 2014

हेलो मैं अरविंद केजरीवाल बोल रहा हूं!

  
पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल रेडियो मिर्ची पर दिल्ली के मुद्दो पर बात करते सुनाई दिये। रेडियो पर केजरीवाल अपना राजनीतिक एजेंडा रख सकते है कि नही या फिर बिना लाइसेंस के कोई रेडियो न्यूज़ कैटेगरी में आने वाले विषय पर किसी राजनेता को बुला सकता है या नही। ये महत्वपूर्ण नही है। महत्वपूर्ण यह है कि फिल्मी गानों के बीच बैठ कर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री को दिल्ली के गंभीर मुद्दों पर चर्चा करने की क्या जरूरत थी। ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी कि जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए केजरीवाल साहब को ऐसा मनोरंजक तरीका अपनाना पड़ा।


अरविंद केजरीवाल की दुविधा समझना इतना मुश्किल भी नही। दिल्ली में चुनाव सिर पर हैं। सीधा मुकाबला दो दलों में ही दिखाई दे रहा है। नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी। कुल 70 विधानसभा सीटों वाली दिल्ली की, राष्ट्रीय राजनीती में खासी धमक है। अलग अलग वजहों से ही सही पर सारे देश की निगाहें दिल्ली की सम्भावित राजनीति और सरकार पर लगी हैं। लोकसभा चुनावों के बाद मुंह के बल गिरी आम आदमी पार्टी के भविष्य की राजनीती दिल्ली के दरवाजे से हो कर ही गुजरती हैं। वहीं मोदी भी ये बात जानते होगें कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार उनकी राजनीतिक उड़ान पर रोक लगा सकती है।

49 दिनों की केजरीवाल सरकार के बाद, दिल्ली के वोटरों ने लोकसभा की सातों सीटे भाजपा की झोली में डाल दी। बड़ा ही रोचक महौल बना। दिल्ली से अरविंद बनारस पहुंचे मोदी को हराने और उधर दिल्ली में एक भी सीट नही जीत सके। दिल्ली में भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच वोटो की खाई बढ़ कर 13% हो गई। लोकसभा चुनावों को पैमाना माने, तो आम आदमी पार्टी को दिल्ली जीतने का सपना देखना छोड़ देने चाहिए और मोदी के लिए दिल्ली फतह बस रस्म अदायगी भर होनी चाहिए। पर राजनीति दो दूनी चार नही होती, कभी कभी तीन या पांच भी होती है।

केजरीवाल साहब की सबसे बड़ी परेशानी प्रधानमंत्री मोदी हैं। भाजपा के रणनीतीकारों ने एकतरह से मोदी को केजरीवाल के सामने फिट कर दिया। हलांकि मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के जगदीश मुखी का नाम उछाल कर केजरीवाल साहब ने मोदी की धार को कुंद करने की कोशिश की। पर मामला कुछ बना नही। भाजपा मोदी के नाम पर ही चुनाव मैदान में उतरेगी। मोदी अभी हॉट केक की तरह बिक रहे हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की सफलता इसका सबूत है। डेवलपमेंट को मोदी बढ़े ही अच्छे अंदाज में वोटर को परोसते हैं। दिल्ली चुनावों में भाजपा मोदी ब्रांड के साथ डेवलेपमेंट को बेचने की कोशिश करेगी। केजरीवाल ने दिल्ली डॉयलाग को आधार बना मोदी से डेवलेपमेंट का मुद्दा चुराने की कोशिश जरूर की। पर अभी इस मुद्दे पर मोदी की रफ्तार केजरीवाल से बहुत तेज हैं।

दूसरी बड़ी बात जिन भावनात्मक मुद्दो पर सवार हो कर आम आदमी पार्टी सत्ता के गलियारों तक पहुंची थी। उनमें से ज्यादातर मुद्दे ठंडे बस्ते में जा चुके हैं। सबसे बड़ा मुद्दा था भष्टाचार का। गजब का जोश था लोगों के गले तक रूंघ जाया करते थे भष्टाचार की बात करते करते। अब वो जोश गायब है उसकी जगह प्रैक्टिकल अप्रोच ने ले ली है। अरविंद केजरीवाल के पास भी छिटपुट आरोपों के अलावा इस मुद्दे पर भाजपा को घेरने के लिए कुछ भी ठोस नही। दूसरा बड़ा मुद्दा जिस पर केजरी सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। वो था जनलोकपाल जो अब आम आदमी पार्टी के एजेंडे पर भी नही है। अनेक कारणों से मंहगाई भी अपने न्यूनतम स्तर पर है। काले धन पर सरकार कमजोर जरूर दिखती है पर कम से कम काम करती दिख रही है। ऊपर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान पुख्ता होने से एक फील गुड फैक्टर भी है।  

आम आदमी पार्टी की राह में मोदी के अलावा एक छुपा रोड़ा भी है। वो है कांग्रेस। आंकड़े बताते है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस के कंधे पर पैर रख कर ही ऊपर पहुंची है। कांग्रेस ने जितने वोट खोये वो ज्यादातर आम आदमी पार्टी की झोली में ही गिरे। कांग्रेस दिल्ली में अपने न्यूनतम स्तर पर है। अगर कांग्रेस अपनी खोई जमीन कब्जाने की ईमानदार कोशिश करती है। तो दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी खतरे में पड़ सकती है। कांग्रेस के लिए भी ये वजूद की लड़ाई है इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि वो दोबारा अपने पांव जमाने की कोशिश करेगी।

अब बात मुस्लिम और दलित वोटर की। पिछले विधानसभा चुनावों में दलित वोटर ने कांग्रेस को छटका दे आम आदमी पार्टी का दामन थामा था। बहुजन समाज पार्टी भी हाशिये पर चली गई थी। स्वच्छ भारत अभियान और प्रधानमंत्री जन धन योजना के माध्यम से मोदी ने दिल्ली के दलितों में सेंध लगाने की कोशिश की है। ये कोशिश कितनी कामयाब होगी ये तो वक्त बतायेगा पर इसने केजरीवाल साहब के माथे पर शिकन जरूर पैदा कर दी होगी। उधर मुस्लिम वोट कांग्रेस के साथ मजबूती से बना रहा और कांग्रेस ने लगभग सभी मुस्लिम बहुल सीटे जीती। पर इस बार कमजोर होती कांग्रेस और मजबूत होती भाजपा के बीच मुस्लिम वोट आम आदमी पार्टी की और झुक सकता है। मोदी के निरंजन ज्योती जैसे मंत्री जाने अनजाने इसमें मददगार साबित हो रहे हैं। बस यही एक फ्रंट है जहां केजरीवाल साहब को राहत मिलती दिख रही है। पर यहां भी सुई कांग्रेस की परफॉरमेंस पर टिकी है।

इतने छोटे बड़े फैक्टर होने के बावजूद लगभग बिना मुद्दो वाला अगामी विधानसभा  चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल होता लग रहा है। पॉपुलर मोदी से सीधी टक्कर और मुद्दो के अकाल के बीच केजरीवाल की मायूसी को समझा जा सकता है। अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए वो कुछ भी नया आजमाने को तैयार हैं। यहां तक कि एफ एम पर रेडियो जॉकी के साथ दिल्ली डिसकस करने को भी। केजरीवाल पिछली गल्तियों की माफी मांग कर फिर से भावनात्मक कार्ड खेलने की कोशिश में है। उन्हें समझना होगा कि वक्त 12 महीने आगे निकल चुका है। अगर उनको दोबारा मुख्यमंत्री बनना है तो बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना होगा। डेवलेपमेंट राजनीती की रेस में मोदी को हराना होगा। अपनी विद्रोहवादी, अराजकतावादी छवि को तोड़ कर अच्छे प्रशासक की छवि बनानी होगी। भावनात्मक अपीलों से तौबा कर कुछ ठोस मुद्दे सामने रखने होंगे। और सबसे बड़ी बात एक गंभीर राजनेता की छवि बनानी होगी और जाहिर है रेडियो जॉकी के साथ फिल्मी गानों के बीच गम्भीर मुद्दो पर चर्चा के ढ़ोंग से तो ये बनेगी नही।







Friday, November 7, 2014

मोदी मोदी नही मुखी मुखी

दिल्ली में नए चुनावों का रास्ता आखिर साफ हो ही गया और साथ ही शुरू हो गई राजनीतिक सरगर्मीयां। चुनाव होने में तो खैर अभी देर है पर पार्टियां चुनावों की तैयारी में लग गईं। इन्ही तैयारीयों के बीच दिल्ली के पिछले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहली प्रैस कॉफ्रैंस कर डाली। उस पत्रकार वार्ता में वैसे तो आम आदमी पार्टी नेताओं ने कई बाते कहीं पर दो बाते बड़ी महत्वपूर्ण थी। पहली आम आदमी पार्टी के एजेंडे से जन लोकपाल मुद्दे का गायब हो जाना। और दूसरा केजरीवाल की तुलना बीजेपी नेता जगदीश मुखी से करना।

अन्ना के कंधे पर सवार हो, जन लोकपाल का झंडा थामें, आम आदमी पार्टी ने जब राजनितिक गलियारों में कदम रखा। तब उनके एजेंडे में जन लोकपाल सबसे ऊपर हुआ करता था। यहां तक की दिल्ली सरकार भी इसी मुद्दे पर गिर गई थी। तर्क यह था कि केजरीवाल को कांग्रेस खुल कर काम नही करने दे रही, इसलिए सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नही है। केजरीवाल का वो बयान याद कीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि भष्ट्राचार के खात्मे के लिए वे तो जन लोकपाल बिल लाना चाहते है पर कांग्रेस, बीजेपी के साथ मिल कर उसकी राह में रोड़े अटका रही है।

सरकार चलाने में नाकाम होने के आरोप भी अरविंद केजरीवाल पर लगे पर वे हमेशा कहते रहे कि जन लोकपाल बिल का विधानसभा में ना पेश हो पाना ही उनके इस्तीफे की असली वजह रही। जनलोकपाल पर हजारों सरकारें कुर्बान करने की बात किया करते थे केजरीवाल। एक न्यूज़ चैनल को दिये गये इंटरव्यू में जब जन लोकपाल के मुद्दे के गायब हो जाने के मसले पर सवाल पूछा गया तो केजरीवाल साहब ने बड़ा ही गोल मोल उत्तर दिया। उनका कहना था कि भष्ट्राचार को खत्म करना उनके एजेंडे पर है और जन लोकपाल उसी एजेंडे का एक हिस्सा भर है। ये वही केजरीवाल है और ये वही आम आदमी पार्टी है जो भष्ट्राचार के खात्में के लिए बस जन लोकपाल ही चाहते थे। किसी और तरीके या कानून से भ्रष्टाचार खत्म किया जा सकता है इसे अरविंद केजरीवाल मानने को तैयार नही थे। यू-टर्न पॉलटिक्स के लिए पहले ही अरविंद केजरीवाल काफी मशहूर है पर जन लोकपाल के मुद्दे पर यू-टर्न समझ से परे है।

दूसरा आम आदमी पार्टी नेताओं ने दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल और बीजेपी के जगदीश मुखी की तुलना करने की कोशिश की। ये बड़ी ही हास्यप्रद कोशिश थी। एक तरफ तो अरविंद कह रहे है कि उन्हें यही नही पता कि उनकी पार्टी उन्हें किस सीट से टिकट देगी। पर दूसरी पार्टी से मुख्यमंत्री  कौन होगा ये उन्हें पता हैं। जबकि भाजपा ये पहले ही साफ कर चुकी है कि वो सामुहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। वजह भी साफ है भाजपा महाराष्ट्र और हरियाणा का जीत वाला मॉडल लागू करना चाहती है। भाजपा की और से डॉ हर्षवर्धन, सतीश उपाध्याय, मीनाक्षी लेखी और यहां तक कि किरण बेदी भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल बताये जा रहे हैं। पर अरविंद की दिलचस्पी मुखी में ज्यादा है। तुलना के पीछे की वजह भी जान ले। दरअसल वो एक जीती हुई लड़ाई लड़ना चाहते हैं। मोदी या हर्षवर्धन से तुलना होने पर अरविंद के चुनाव हारने की सम्भावना ज्यादा होगी। पर मुखी को वो एक कमजोर कैडिडेट मानते है। और कमजोर के साथ ही लड़ना चाहते है। ये एक विशुद्ध राजनितिक पैंतरा है, इसका क्लीन पॉलटिक्स से कुछ लेना देना नही।

पिछले लोकसभा में आम आदमी पार्टी ने अपने दम पर चुनाव लड़ा। देश भर में दिल्ली की सफलता दोहराना चाहती थी आम आदमी पार्टी। यहां तक कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का रथ रोकने दिल्ली से बनारस जा पहुंचे गए थे केजरीवाल। पर परिणाम क्या आये, आम आदमी पार्टी के 96% उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। जहां आम आदमी पार्टी की सरकार हुआ करती थी उस दिल्ली से एक भी सांसद नही जीत पाया। चुनावों से पहले प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले अरविंद केजरीवाल खुद लाखो वोटों से चुनाव हार गए। लोकसभा चुनावों ने पार्टी को उसकी ताकत का अहसास करा दिया। संसदीय चुनावों के बाद पार्टी इस कदर सहम गई कि हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया। जबकि हरियाणा में एक सर्वे के दौरान आम आदमी पार्टी कार्यकर्त्ताओं ने चुनाव लड़ने के पक्ष में फैसला दिया था।

एक तरह से मोदी से हार के डर को आम आदमी पार्टी ने स्वीकार कर लिया है। केजरीवाल की जगदीश मुखी से की गई तुलना मोदी से डर का हिस्सा लगती है। तो फिर आम आदमी पार्टी के पास आखिर रास्ते क्या बचे है। राष्ट्रीय स्तर पर वे अपनी ताकत को आजमा कर देख चुके हैं। मोदी की वजह से दिल्ली में दोबारा सत्ता हाथों से फिसलती लग रही है। और अगर दिल्ली भी हारे तो पॉलटिक्स फिर से शुरू करनी पड़ेगी। जो उफान उन्हें दिल्ली की जनता ने दिया था आम आदमी पार्टी उसे बनाये रखना चाहती हैं।

पर ये इतना आसान नही। और हां मोदी की जगह मुखी का नाम लेने जैसी बचकाना हरकतों से तो कतई मुमकिन नही। फिर आखिर करें तो करें क्या। दरअसल सवाल भाजपा या आप की जीत या हार का नही है। सवाल यहां मोदी, हर्षवर्धन, मुखी या केजरीवाल का भी नही हैं। सवाल है आम आदमी पार्टी की खोई हुई साख का। पार्टी को कुछ बातें समझनी होगी। आप एक बहुत बड़े जनआंदोलन से उभरी थी। एक ज्वार था जो वोटों के रूप में आम आदमी पार्टी पर बरसा। लोग बदलाव चाहते थे। पर अब वो कोई भी कारण मौजूद नही है। ऊपर से अरविंद की छवि एक ज्यादा बोलने वाले और काम से भागने वाले नेता की बन गई है। मोदी के उभार ने भी राजनीती की दशा बदल दी हैं। ऐसे में पुराने तरीकों को छोड़ आम आदमी पार्टी को जमीन से जुड़े मुद्दे उठाने होगें। जैसे आप ने दिल्ली के बाद देश जीतने का सपना देखा था। वैसे ही इस बार हारे या जीते आम आदमी पार्टी को दिल्ली के बाद दिल्ली नगर निगम यानि एम सी डी के चुनावों में उतरना चाहिए। जमीन से जुड़ी राजनीती की शुरूआत करनी चाहिए। अपने को साबित करना चाहिए। तभी पार्टी को अपनी साख वापस मिलेगी। जमीन से जुड़ाव ही पार्टी को जिंदा रखेगा।    

Sunday, November 2, 2014

विशाखापत्तनम्- जीत ली हुदहुद तूफान से जंग

तूफान अक्सर गुजर जाया करते हैं, पर हुदहुद घंटों तक विशाखापत्तनम् को झकझोरता रहा। फाइटर प्लेन जैसी आवाज़ वाली हवायें दिल में डर पैदा कर रही थीं। टीन की चादरें अनगाईडेड मिसाईलों की तरह जहां तहां हमले के लिए निकल पड़ीं। खिड़कियों और दरवाजों में लगे कांच हवा की मार सह ना सके और धमाकों के साथ टूट कर बिखर गए। आसमान काला पड़ गया। हवा ने जो कचरा आसमान में पहुंचा दिया था वो गोलियों की तरह विशाखापत्तनम् पर बरसता रहा। जिस पेड़ ने भी हवाओं का रास्ता रोकना चाहा उसको हवाओं ने जमीन पर ला पटका। जो पेड़ बचे भी वो भी अधमरी हालात में, पत्तियां तक नौच डाली हुदहुद ने। तूफान के बीच एक वक्त ऐसा भी आया जब हवाऐं थम गई। सूरज निकल आया। पर ये भी हुदहुद की चाल भर थी क्योंकि ये वो वक्त था जब तूफान की आंख यानि तूफान के सेंटर ने विशाखापत्तनम् को छुआ था। आने वाले चंद घंटे और भयानक साबित हुए।


विनाश की तस्वीरें 










हवायें थमने के बाद डरे सहमें लोगों ने जब घरों से बाहर झांका। तो हर तरफ बिखरे मलबे ने उनके कदमों को रोक दिया। कार मोटरसाईकिल तो क्या पैदल तक नही चला जा सकता था। चारो तरफ उखड़े पड़े विशाल पेड़ों ने रास्ते जाम कर दिये। मेन रोड ही नही गलियों तक में पहुंच मुश्किल थी। ज्यादातर मोबाईल टॉवर भी ध्वस्त हो चुके थे। लोग अपने ही घरों में फंस कर रह गए। एक तरह से हुदहुद ने विशाखापत्तनम् के 17 लाख लोगों को हाऊस अरेस्ट की सजा सुना दी। आंध्र प्रदेश में 46 जिंदगियां लील गया था हुदहुद। 70 हजार करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान हैं। जब सभी हुदहुद की कैद से आजाद होने को झटपटा रहे थे। तब रिलायंस JIO के हेड कंसट्रक्शन मि. राव ने पास के शहर काकीनाडा से पांच पैट्रोल से चलने वाली आरा मशीने मंगाने की पहल की। काकीनाडा में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की ऑफशोर फैसिलिटी है इसलिए तुरंत एक्शन हुआ और अगले दिन यानि 14 अक्तूबर को आरा मशीनें विशाखापत्तनम् पहुंच गई।



रिलायंस के स्थानीय कर्मचारियों का एक दल बनाया गया और ये वालियंटरस तुरंत काम में जुट गए। ज्यादातर के पास इस तरह की आरा मशीनों को चलाने का कोई अनुभव नही था। ये मशीनें इतनी ताकतवर है कि पलक झपकते ही बड़े से बड़े पेड़ के टुकड़े कर डालती हैं। पर रिलायंस वालियंटरस के लिए अपनी जान से ज्यादा जरूरी था कम्यूनिकेशन का पहला साधन यानि सड़क खोलना। चूंकि रिलायंस JIO कम्यूनिकेशन के फील्ड में सबसे तेज़ 4G डाटा सर्विस देने की तैयारी कर रहा है इसलिए रिलायंस के ये वालियंटरस जानते थे कि कम्यूनिकेशन कितना महत्वपूर्ण हैं।

प्रो. जी एस एन राजू, वाईस चांसरल आंध्रा यूनिवर्सिटी
जल्द ही ये खबर शहर में फैल गई कि रिलयंस अपनी विशेष आरा मशीनों से शहर की सफाई में जुटा है। आंध्रा यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर प्रो. जी एस एन राजू भी उनमें से एक थे। यूनिवर्सिटी कैम्पस की हालत तो और भी खस्ता थी। 50 हजार से ज्यादा पेड़ जमीन सूंध रहे थे। सैकड़ों गिरे पेड़ों ने कैम्पस की सड़को को बंद कर रखा था। हुदहुद ने आंध्रा यूनिवर्सिटी को एक खुले कबाड़गाह में तब्दील कर दिया था। पहले दो दिन तो पैदल भी यूनिवर्सिटी गेट तक नही पहुंचा जा सकता था। शहर की बिजली बंद थी। इसलिए कैम्पस में मौजूद एकमात्र आरा मशीन जो बिजली से चलती थी बेकार पड़ी थी। प्रो. राजू ने 15 अक्तूबर को रिलायंस से मदद मांगी और 16 अक्तूबर को रिलायंस के वालियंटर अपनी 5 आरा मशीनों के साथ कैम्पस की सफाई के लिए मौजूद थे। पेड़ हटने से रास्ता बना तो JCB और ट्रक भी अंदर आ पाये और काम ने तेजी पकड़ी। रिलायंस की इस नई सोच ने हमें भी प्रेरित किया इसलिए ही हम इतनी जल्दी कैम्पस खोल पायें यूनिवर्सिटी रजिस्टरार प्रो के आर एम राव ने बड़े खुले दिल से ये बात कही।
 


GVMC कमीशनर कु. जानकी को पॉवर आरा मशीनें सौपीं गई
रिलायंस द्वारा मंगाई गई मशीने इतनी कारगार साबित हो रही थी कि लोकल प्रशासन ने भी रिलायंस से मदद की गुहार लगाई। सड़कों पर रूकावट होने की वजह से जरूरी सामान की किल्लत हो गई। दूध, सब्जियां, खाने पीने की चीजें, पैट्रोल कुछ भी विशाखापत्तनम् नही पहुंच पा रहा था। स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए रिलायंस ने तुंरत 100 आरा मशीनों का ऑर्डर दे दिया। 24 घंटों से भी कम समय में ना केवल नई मशीने खरीदी गई, उन्हें विशाखापत्तनम् तक पहुंचाया गया। बल्कि उन्हें विशाखापत्तनम् की म्यूनिसिपल कमीशनर को सौंप भी दिया गया। हम जिंदगी की अहमियत समझते है इसीलिए ये काम हम इतनी तेजी से कर सके। ये कहते हुए रिलायंस के हेड कंसट्रक्शन मि. राव की आंखों में चमक आ गई।

उधर विशाखापत्तनम् के चिड़ियाघर में हालात बहुत बुरे बने हुए थे। 600 एकड़ में फैला है ये विशाल चिड़ियाघर। जानवरों के कुछ बाड़े बिलकुल तबाह हो गए। बटरफ्लाई ग्रीन हाऊस में एक भी तितली जिंदा नही बची। हुदहुद तूफान की तेज हवाओं और बारिश को वो झेल ना सकीं। दलपति (हिप्पो) के बाड़े की दीवार ढ़ह गई। चार जहरीले पॉयथन भी मौका देखकर भाग निकले। पर सबसे बड़ी मुश्किल आ रही थी जानवरों तक खाना पहुंचाने की। गूंगे जानवर बस शोर मचा सकते थे और आदमी उन से भी ज्यादा असहाय था। हजारों पेड़ जो पड़े थे,
गनपति (हिप्पो) खाना खा कर खुश है।
जानवरों और ज़ू कर्मचारियों के बीच। अन्य संस्थानों की तरह ज़ू के केयरटेकर की सहायता की अपील भी रिलायंस ठुकरा ना सका और करीब 8 आरा मशीनें ज़ू कर्मचारियों को सुपुर्द कर दी गई। ज़ू की पूरी तरह सफाई में तो अभी महीनों लगेगें पर राहत की बात यह है कि सभी बेजुबानों को वक्त पर खाना मिल रहा है।
  
हुदहुद के हमले से विशाखापत्तनम् कुछ देर के लिए डर जरूर गया था। पर उसने मोर्चा नही छोड़ा। शहर ने जीने का हौंसला बनाये रखा। सरकार की मदद से जल्द ही स्तिथियों पर काबू कर लिया गया। सड़कों को साफ कर दिया गया। पीड़ितों को रसद मिली। बिजली दोबारा चालू हुई। बाजार खुल गए, जरूरी सामान मिलने लगा। पूरे शहर ने एक प्रशिक्षित कमांडो की तरह मुकाबला किया। यहां तक कि सरकार की एक अपील पर पूरे विशाखापत्तनम् में दीवाली पर एक पटाखा तक नही छोड़ा गया। क्योंकि सड़क किनारे पड़ी सूखी पत्तियां, टहनियां और पेड़ों में आग लग जाने का खतरा था।


इस तूफान में 20 लाख के करीब पेड़ों ने दम तोड़ दिया। अब सबसे बड़ी चुनौती है विशाखापत्तनम् को फिर से हरा भरा बनाना। सरकार 10 नवम्बर से इसके लिए अभियान चलायेगी। यूनिवर्सिटी ने भी 50 हजार नए पेड़ लगाने का फैसला लिया है। आईये हम भी प्रण ले कि पेड़ो को ना नुकसान पहुंचाएगें और जो नुकसान पहुचाने की कोशिश करेगा उसको रोकेंगे क्योंकि बिना पेड़ों के ये दुनिया बहुत डरावनी लगती है।  

Saturday, September 20, 2014

कश्मीर- गंवा दिया ऐतिहासिक मौका

18 सितम्बर 2014, शाम 5 बजे। बाढ़ग्रस्त श्रीनगर का बेमीना इलाका। सड़क किनारे कारों की कब्रगाह सी बनी है। सैकड़ों कारें पानी में अभी भी डूबीं हैं। बाढ़ का पानी कुछ कम जरूर हुआ, पर अभी भी जानलेवा स्तर पर है। पानी उतरने के बाद मकानों पर खिंची मटमली सी लकीरें बताती है की पानी का कहर कहां कहां तक बरपा था। रात होने को है, पर मुख्य सड़क पर लोगों के झुंड के झुंड खड़ें हैं। उनके यूं इकट्ठा होने में एक पैटर्न साफ तौर पर दिखाई देता है। लोगों के ये झुंड गलियों के मुहाने पर भीड़ लगाये खड़े हैं। दरअसल ये वे बदनसीब लोग है जिनके घर उन गलियों में हैं, जो बाढ़ के पानी से लबालब भरीं हैं। खड़ा पानी सड़ने लगा है, पर इस भारी बदबू के बीच भी नाक ढ़ापे हजारों लोग अपने घरों को लौटने का इंतजार कर रहे हैं।

धुंधलका बढ़ने लगा है, गली में कहीं दूर टार्च की रोशनी चमकती है और कई मुरझाये चेहरों से फिसलकर दूसरी तरफ चली जाती है। कोई कश्मीरी में कुछ बोलता है। तभी नाव जैसी कोई चीज दिखाई देती है। इसे नाव बस इस लिए कहा जा सकता है क्योंकि ये अभी तक पानी में डूबी नही। तभी किसी ने मुझसे कुछ पूछा। कहां से आये हो आप। मुंबई, मैनें बात ना बढ़ाने की गर्ज से छोटा सा जवाब दिया। अब क्यों आये हो। इस अकेले सवाल में कई तरह के भाव थे। उलाहना भी था, अपनापन भी और गुस्सा भी। मैं ठीक से समझ नही पाया। कोई 22-24 साल का नौजवान था। कई दिनों तक पानी में फँसे रहने के बाद कुछ दिन पहले ही निकल पाया था। उसने नाव जैसी चीज को दिखाते हुए कर्कश आवाज में कहा, वो देख रहे हैं आप ये किसी सरकार ने नही भेजी, ये हमने अपने हाथों से तैयार कर की है। और जितनी भी नावें आप देख रहे है, जो गलियों से लोगों को निकाल रहीं हैं वो सब हमने ही अपनी कोशिशों से बनायी है। वाकई एक नाव को छोड़ सारी की सारी नावें हर उस चीज से बनाई गई थी जो तैर सकती थी।

बातों ही बातों में उस नौजवान ने अपना नाम शाहिद बताया। वो अभी किसी कॉलेज से डिग्री लेने की कोशिश कर रहा था। मेरे बताने पर की मैं रिलायंस फाउंडेशन की टीम के साथ आया हूं और फाउंडेशन स्वास्थय सम्बंधी मदद पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। महामारी ना फैले इसके लिए भी कई कदम उठाये जा रहे हैं। पीड़ितों को दवाईयां पहुंचाई जा रही हैं। तो वो कुछ नरम पड़ा और बोला- ये बाढ़ अल्लाह का कहर है। पर तुरंत ही उसकी आवाज में पहले जैसा पैनापन आ गया। कोई नही आया हमें बचाने। आर्मी आई पर केवल इंडियन टूरिस्टो को बचाने, कश्मीरियों को बचाने कोई नही आया। हमें किसी से उम्मीद भी नही है, ना जेएंडके सरकार से ना ही इंडिया से। उसने यह बात कुछ इस लहजे से कही जिसमें परायापन साफ झलक रहा था। पर वो अपनी धुन में बोलता ही चला गया। जब इन सरकारों के बस में कुछ नही था तो पाकिस्तान को बोल देते उसने भी तो मदद को कहा था। चाईना ने भी इंडिया को कहा था कि हमें कश्मीर में आने दो हमारे पास वो तकनीक है। जिससे 48 घंटे में पूरे शहर का पानी निकाल देगें पर इंडिया ने नही आने दिया। पर उनको क्या, झेल तो कश्मीरी रहा है ना। दो हफ्ते बीत गये आज तक पानी नही निकला साहब, पूरे इलाके में एक पंप तक नही लगा। मरे हुए जानवर भी अभी तक पानी में तैर रहे हैं, उनको उठाने तक की भी फुर्सत नही है इनके पास। सच भी था कुछ देर पहले ही हम मिलिट्री कैटल शेड में मरे जानवरों की लाशे देख कर आये थे।

क़मरवारी सड़क से होटल लौटते वक्त झेलम नदी से सामना हुआ वही झेलम जिसने धरती की जन्नत का चेहरा ही बिगाड़ दिया। वो अपनी ही गति से बह रही थी। खतरे के निशान से नीचे। पर झेलम के ऊपर बने पुल से गुजरते वक्त एक खतरा मैं बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा था। और वो था अविश्वास का। कश्मीरियों के विश्वास को जीतने का सुनहरा मौका गवायां जा चुका था। मुंबई के अखबारों में श्रीनगर में बाढ़ की खबरे पढ़ते और आर्मी के जवानों की आवाम को बचाने वाली फोटो देख कर लगता था कि भारत ने और खासकर सेना अपने कश्मीरी भाईयों का दिल जीत लिया है। पर केवल शाहिद ने ही मुझे हिला कर रख दिया। इंडिया वापस जाओ के कुछ बैनर सोशल मीडिया पर जरूर देखे थे। पर तब सोशल मीडिया और मेन स्ट्रीम मीडिया पर सेना के जवानों के कारनामों को इस तरह पेश किया जा रहा था। जिसमें शाहिद सहित सभी कश्मीरी पीछे छूट गये। सेना का बचाव कार्य बड़ा हो गया और कश्मीरी आधी अधूरी राहत के साथ बौना हो गया।

श्रीनगर की बाढ़ के भयानक चेहरे का जो हिस्सा हम दिल्ली, मुंबई या देश के अन्य हिस्सों से देखते है वो कश्मीर में कश्मीरियों के लिए इतना अलग क्यों हो जाता हैं। एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा परेशान कर रही थी, वो थी शाहिद की चाईना की प्रस्तावित मदद वाली बात। जोकि सिरे से निराधार थी, अफवाह थी। पर ये अफवाहे आखिर कश्मीर में जगह कैसे बना लेती है। इनको हवा कौन देता है। दूसरी तरफ देश के बाकी हिस्सो के सामने कश्मीर के बाढ़ पीड़तों की असलियत क्यों नही आ रही। अगर राहत में देरी हो रही है तो मेन स्ट्रीम मीडिया उसे शिद्दत से क्यों नही उठा रहा।

दरअसल सोच में इस गैप के दो कारण है। पहला लोकल प्रशासन यानि अब्दुल्ला सरकार और दूसरा राष्ट्रीय मेन स्ट्रीम मीडिया। वैसे तो देश में बहुत सी ऐसी सरकारें है जिनसें लोग संतुष्ट नही, पर उमर सरकार ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये। इतनी नाकामी जिसे बयां नही किया जा सकता। श्रीनगर की सड़कों से गुजरते हुए सरकार की नामौजूदगी को आप महसूस कर सकते है। लोग अपनी मदद स्वंय कर रहे हैं। कोई सरकार कहीं दिखाई नही देती। रिलिफ के काम में कोई कॉरडिनेशन नही। जो NGO सरकार और आम कश्मीरियों की मदद को आगे आयें हैं, उन्हें कहां कैंप लगाना है जिससे पीड़ितों तक जल्दी पहुंचा जा सके, ऐसी बेसिक जानकारियां भी सरकार मुहैया नही करा पा रही। नाकारेपन का आलम यह है कि देशभर से इकट्ठा कर कश्मीर भेजी जा रही मदद भी सही हाथों में नही पहुंच पा रही। लोगों का गुस्सा सांतवे आसमान पर है वे अब कोई सरकारी इमदाद नही चाहते। वो सरकार को सबक सिखाने के मूड में हैं। सरकार की इस नाकामी और संवादहीनता की वजह से जो प्यार और सहायता पूरे देश से कश्मीर के वासियों के लिए आई थी। वो ना तो सहायता ही उन तक पहुंच सकी और ना ही प्यार और सहानुभूति। क्योंकि उसको पहुंचाने वाली सरकार कहीं थी ही नही। इसलिए देश के अन्य हिस्सों में लगता रहा कि सब ठीक है जबकि कश्मीर में कुछ भी ठीक नही था।

दूसरी बड़ी वजह बना मीडिया। ऐसे नाजुक वक्त में मीडिया से एक गंभीर भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती हैं। पर मीडिया अपने रोल में पूरी तरह से फेल हो गई। मीडिया ने तीन बड़ी  गलतियां की पहली गलती- सेना की जरूरत से ज्यादा तारीफ। ऐसी किसी भी बाढ़ में हजारों लोगों तक मदद टाईम पर नही पहुंच पाती। विकसित देश भी इसका अपवाद नही हैं। बहुत से लोग मदद ना मिलने पर निराशा और गुस्से का शिकार हो जाते है। ऐसे में अगर मीडिया सेना की जरूरत से ज्यादा तारीफ करेगा तो उल्टा ही पड़ेगा। और उसमें में भी तब जब आपसी अविश्वास का एक लम्बा इतिहास हो। दूसरी गलती- वादी के अलगाव-वादी नेताओं को निशाना बनाना। सेना की तारीफ तक तो फिर भी ठीक था। आप इसे अंधी देशभक्ति की श्रेणी में रख सकते हैं। पर जब सारा ध्यान बचाव में लगना चाहिए तब TRP के दवाब में राजनितीक टिप्पणीयों ने कश्मीर का माहौल और खराब कर दिया। यहां तक कि एक न्यूज चैनल ने तो बाढ़ को बहाना बना कुछ नेताओं को अरेस्ट करने की कैंपेन तक शुरू कर दी। गलत रिपोर्टिंग तीसरी बड़ी गलती थी। बाढ़ग्रस्त इलाकों की सही तस्वीर तक पेश नही कर पाये न्यूज चैनल। क्योंकि सारा ध्यान तो सेना और अलगाववादी नेताओं की तरफ था। अपनी एक्सपर्टी का इस्तेमाल कर मीडिया को लोकल प्रशासन की मदद करनी चाहिए थी पर ऐसा हो ना सका। और जाने अनजाने ही सही मीडिया ने अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया।


इसमें कोई शक नही की सेना ने वादी में अच्छा काम किया। इसमें भी कोई शक नही की कश्मीरियों को मदद देने पूरा देश एकजुट हुआ। पर हमें इसे भी मानना होगा कि श्रीनगर में जो मदद की दरकार थी हमसब उससे कोसो दूर रहे। ये वक्त निराशा का नही आत्मचिंतन का  है। कहते है हर बुरे के साथ मौके भी दस्तक देतें हैं। श्रीनगर में आई बाढ़ एक मौका था जब हम दिलों की दूरियों को कम कर सकते थे। जब हम अविश्वास की गहरी खाई को पाट सकते थे। शाहिद का गुस्सा जायज है, वो यानी कश्मीरी बस एक कदम की दूरी पर थे। पर हमने ये मौका गंवा दिया।

Tuesday, August 12, 2014

संघ परिवार का मोदी विरोध


कुछ लोग बोल रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली, कुछ लोग बोल रहें हैं कि कोई व्यक्ति के कारण जीत मिली। कोई व्यक्ति, पार्टी या संगठन की वजह से यह परिवर्तन नही हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन चाहा। ये लोग और पार्टी तो पहले भी मौजूद थे, तब सत्ता क्यों नही मिली? लोगो ने परिवर्तन चाहा तब पार्टी को सत्ता मिली" - मोहन भागवत


पहली नजर में संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस वक्तव्य में कुछ भी गलत नही लगता। सरसंघचालक ने ये बात 10 अगस्त को उड़ीसा में संस्कृत सुरक्षा समिति के एक कार्यक्रम के दौरान कही। इसके ठीक दो दिन पहले यानि 8 अगस्त को दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीत का सेहरा अमित मोदी के सिर बांध चुके थे। मोदी ने अमित शाह को 2014 लोकसभा चुनावों का मैन ऑफ द मैच क्या कहा, भाजपा के 11 अशोक रोड स्थित केंद्रीय कार्यालय में उसकी जोरदार गूंज सुनाई देने लगी। तभी मोहन भागवत का ये बयान आया। कोई कुछ भी कहे पर वक्तव्य की टाइमिंग अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
 
Courtesy: https://www.facebook.com/milind.ranade.3?fref=ts
भागवत अकेले नही हैं, संघ परिवार के कई और संगठन भी अब मोदी और मोदी सरकार के विरोध में कूद पड़े हैं। CSAT पर संघ के विद्यार्थी संगठन, विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली और देशभर में जोरदार प्रदर्शन किये। छात्रों को काबू पाने के लिए पुलिस को कई जगह काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। रक्षा और इंशोयरंस क्षेत्र में FDI की सीमा बढ़ाने का भारतीय मजदूर संघ खुला विरोध कर रहा है। स्वदेशी जागरण मंच मौजूदा सरकार के केंद्रीय बजट को फेल घोषित कर चुका है। मोदी सरकार द्वारा, जी एम बीज़ों के खुले परीक्षण की अनुमति दिये जाने को भी उसने सिरे से नकार दिया है। एक कदम आगे बढ़ कर स्वदेशी जागरण मंच ने मोदी सरकार को ही एक धोखा बता दिया।भारत के लोग, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को चुना, वे स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। स्वेदेशी जागरण मंच द्वारा जारी प्रैस विज्ञप्ति की इस एक लाईन से ही आप विरोध की तीव्रता को सूंघ सकते हैं। उधर प्रवीण तोगड़िया और मोदी की अनबन तो जगजाहिर है। पर शुद्ध हिंदुवादी संगठन विश्व हिंदु परिषद की पत्रिका हिंदु विश्व के ताज़ा अंक में सम्पादक मान्वेद्र नाथ पंकज ने नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए लिखा हैं कि पाकिस्तान से बार बार दोस्ती की पींगें बढ़ाने की हूंक नरेंद्र मोदी जैसे नेता के मन से भी नही जा रही तो क्या ये हमारे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण नही है।सम्पादकीय में मुस्लिम तुष्टिकरण के विषय पर मोदी सरकार की दो अहम मंत्रियों नज़मा हेपतुल्ला और सुषमा स्वराज को भी निशाने पर लिया गया है।

संघ परिवार का विरोध झेल रही बीजेपी भी उसी परिवार का एक हिस्सा है। तो फिर क्या ये माना जाना चाहिए कि परिवार में फूट पड़ गई है। संघ समर्थक विचारक ऐसा नही मानते। वे ऐसे कई उदाहराण गिनाते है जब परिवार के अन्य संगठन एक दूसरे के सामने आ खड़े हुए। ताजा मामला 25 जुलाई का है, भारतीय मजदूर संघ ने राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ जयपुर में रैली निकाली थी। तर्क यह है कि संघ परिवार के संगठन अलग अलग क्षेत्रों में काम करते है। उनका ना केवल कार्य क्षेत्र अलग है उनके मुद्दो में भी कोई समानता नही हैं। बल्कि कई बार तो किसी खास मुद्दे पर टकराहट जैसी स्थिति बन जाती है। पर इस का मतलब यह नही कि परिवार में फूट पड़ गई। संगठनों के आपसी विरोध को संघ समर्थक आदर्शवादी चश्में से देखते है। उनका मानना है कि सभी संगठन हिंदुवादी विचार से जुड़े है और कभी कभार उभरने वाले विरोधों को आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाता है।

दूसरी और इन विरोधों को नूरा कुश्ती मानने वालों की कोई कमी नही। जब मामला मिल बांट कर सुलझा ही लिया जाना है, तो विरोध का नाटक क्यों। संघ विरोधी इन औपचारिक विरोधों की तीव्रता पर भी सवालिया निशान लगाते हैं। पिछली राजग सरकार के समय FDI के मुद्दे पर भारतीय मजदूर संघ ने स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी की लीडरशिप में जबरदस्त देशव्यापी आंदोलन चलाया था। रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली भी हुई। पर मोदी सरकार के खिलाफ भारतीय मजदूर संघ बस गाल बजाता रहा और मोदी ने FDI सम्बंधित तमाम फैसले ले लिए।

सरकारें निरंकुश ना हो जायें इस लिए सदन में विपक्ष की और समाज में अलग अलग तरह के संगठनों की सख्त जरूरत होती है। इन्हीं सब की बदौलत देश में समाजिक, आर्थिक और राजनितिक संतुलन कायम रहता हैं। देश में मोदी सरकार को संयमित रखने के लिए क्या सचमुच पर्याप्त विपक्ष मौजूद है? हालत यह है कि दिशाहीन कांग्रेस में दमदार विपक्ष का कोई लक्ष्ण दिखाई नही देता। यहां तक कि लोकसभा में विपक्ष का नेता पद भी अब उसके पास नही है, क्योंकि वो जरूरी 55 सीटे भी नही जीत पाई। स्वस्थ परम्परा के नाम पर मोदी कांग्रेस पर दया दिखाने को बिलकुल तैयार नही हैं। कांग्रेस की दावेदारी नकारते हुए, लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद भी अब जयललिलता की AIADMK  पार्टी के एम थम्बीदुरई को दिया जा सकता है। मतलब साफ है मोदी विपक्ष की ताकत को कम से कम कर देना चाहते है। दूसरी तरफ बीजेपी पहले ही मोदी के सामने घुटने टेक चुकी है। अपने करीबी अमित शाह को बीजेपी अध्यक्ष पद पर बैठा कर मोदी सरकार के साथ साथ बीजेपी के भी एकछत्र नेता बन चुके हैं। अब सरकार के भीतर की बात कर लें। कैबिनेट के बंद दरवाजों से जो खबरें छन कर बाहर आ रही हैं। उनके मुताबिक सारे अहम फैसले मोदी ही लेते हैं। कैबिनेट के सामुहिक फैसले लेने और स्वतंत्रत तरीके से काम करने की काबलियत शक के दायरे में हैं।
    
राजनीतिक विरोध शून्यता के बीच न्याय व्यवस्था भी अपनी चमक खो रही है। ज्यूडिशरी सिस्टम अपने पूर्व मुख्य न्यायधीश काटजू के सवालों और आरोपों में ही उलझा है। उधर सरकार ने 11 अगस्त को नेशनल ज्यूडिशियल एपॉइंटमेट बिल पेश कर दिया। बिल पास हुआ तो कमीशन जजो की नियुक्ति करेगा। इसके अच्छे बुरे प्रभाव अभी सामने आने बाकी हैं पर पुरानी व्यवस्था खत्म हो जायेगी। यकीनन तब तक ज्यूडिशरी में उहापोह की हालत बनी रहेगी। देश में NGO की छवि पहले ही बहुत अच्छी नही थी। कुछ NGO  के खिलाफ अभियान क्या चला, सभी NGO लोगों को चोर नजर आने लगे। उनकी विशवसनीयता को भारी धक्का पहुंचा है। अन्ना का समाजिक आन्दोलन भी रामलीला मैदान से जंतर मंतर पहुंचते पहुंचते राजनीतिक पार्टी में बदल गया। केजरीवाल भी राजनीति में अनाड़ी साबित हुए। अन्ना आन्दोलन के बाद निकट भविष्य में कोई स्वयं स्फूर्त समाजिक आंदोलन के खड़े होने की उम्मीद भी अब कम ही बची है। यानि विरोध के स्वर जहां जहां से आ सकते थे, वे सब अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।  

जो ऐतिहासिक विरोध शून्यता देश में बनी है वो यकीनन मोदी की वजह से नही है। ना टाले जाने वाली परिस्थितियों की वजह से देश में बस मोदी ही मोदी नजर आने लगें हैं। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा की मोदी में निरंकुश होने के लक्षण नजर आने लगे हैं। पर फिसलन भरी जगह पर सम्भल कर चलने की बजाये फिसलन की वजहों को खत्म करना ज्यादा कारगर रहता है। इस खास वक्त में संघ राजनैतिक सतुलंन कायम करने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है। मोहन भागवत को विरोध की एक ऐसी लकीर खींचनी होगी जिससे रचानात्मक विरोध तो हो और संघ परिवार भी बना रहे। ऐसी हालत में जब संसद में और पार्टी में मोदी को दूर दूर तक कोई खतरा ना हो तब संघ परिवार के भीतर से विरोध के स्वर उभरना सत्ता सतुंलन कायम कर सकता हैं। इस विरोध का स्वागत होना चाहिए, फिर चाहे ये विरोध औपचारिक ही क्यों ना हो।




Friday, August 8, 2014

गांधी खानदान के हाथों फिसलती कांग्रेस


राहुल गांधी संसद के वेल में पहुंचे नहीं कि खबर बन गई। कांग्रेसी सांसदों के साथ मिल कर राहुल ने खूब नारेबाजी की। दस साल तक लोकसभा में सत्ता की बेंचों पर सुख की बंसी बजाते हुए राहुल ने बहुत कम ही संसद की बहसों में हिस्सा लिया
था। फिर ऐसा क्या हो गया कि राहुल को अपने खोल से बाहर निकल कर शोरगुल और नारेबाजी का सहारा लेना पड़ा। दरअसल लोकसभा में करारी हार के बाद कांग्रेस की हालत पस्त है। गांधी परिवार पर अंदर और बाहर हर तरफ से हमले हो रहे हैं। नैशनल हेराल्ड की सम्पत्ति के अवैध इस्तेमाल का मामला कोर्ट में है। उधर सोनिया प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनी, इस बात का खुलासा कर गांधी खानदान के पुराने वफादार नटवर सिंह ने सोनिया के आभामंडल को नौंच खसौंट कर रख दिया है। प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद बनी त्याग की मूर्ति वाली छवि को नटवर ने तहस नहस कर दिया। नैतिकता की जो डोर सोनिया ने मजबूती से थाम रखी थी, उस को काटने की पूरी कोशिश नटवर ने अपनी किताब में की है। हलांकि सोनिया ने अपनी तरफ से भी किताब लिखने की घोषणा कर आग में पानी डालने की कोशिश जरूर की है, पर जो नुकसान होना था हो चुका।

उधर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह की किताब भी मार्केट में आने की संभावना है। किताब मूलरूप से मनमोहन की ईमानदारी और कांग्रेसी नेताओं द्वारा उनकी राह में बिछाये गए कांटो के बारे में होगी। ईशारों में ही सही निशाने पर गांधी खानदान ही होगा। कभी कांग्रेस में बिना गांधी परिवार की मर्जी के एक पत्ता भी नही हिलता था, पर हालात अब बदल रहे हैं। अब तो हर छोटा-बड़ा नेता गांधी परिवार पर निशाना साध रहा है। पंजाब के नेता और कांग्रेस कार्यसमिती के पूर्व सदस्य जगमीत बराड़ ने तो सोनिया और राहुल को दो साल के लिए छुट्टी पर चले जाने की नसीहत दे डाली। आग अभी बुझी भी नही थी कि उन्होंने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की हालत लावारिस कुत्ते के बराबर बता दी।


राज्यों में भी कांग्रेसियों की हालात बिना जनरल के अधमरी सेना जैसी होती जा रही है। हरियाणा में कांग्रेस के बड़े नेता बीरेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। असम के स्वस्थय मंत्री हेमंत विश्व सरमा ने मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। महाराष्ट्र में आला नेताओं की खींचतान के बीच कोकंण के कद्दावर नेता नारायण राणे पार्टी से इस्तीफा दे कर दोबारा पार्टी में अनमने मन से लौट चुके है। सहयोगी दलो के साथ भी रिश्तों में अब वो गर्मजोशी दिखाई नही देती। एनसीपी की लगातार धमकियों के बावजूद महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन बचाने के लिए कांग्रेस को झुकना पड़ा। एनसीपी ने पिछले चुनावों के मुकाबले आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने कोटे से दस सीटें ज्यादा हड़प ली। नेशनल कॉफ्रेंस ने भी आगामी जम्मू कश्मीर चुनावो में कांग्रेस से पल्ला झाड़ लिया है।

कल तक गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना कोई कांग्रेसी कर ही नही कर सकता था। पर आज ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस के भीतर से ही विऱोध के स्वर उठने लगे। विरोध कई स्तर पर है मुखर भी, बौध्दिक भी और कहीं गहरे भी। मुखर विरोध तो कई तरफ से हो रहा है, पर कुछ दूसरे तरह के विरोधों पर भी नजर डालें। कांग्रेस ने जब संसद में इंश्योरेंस बिल को लटकायें रखा। तब वरिष्ठ नेता और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिहं ने इंश्योरेंस बिल पर कांग्रेस को राजनिति से बचने की सलाह दी। उनका मानना है कि इससे कांग्रेस की छवि खराब होगी।

गांधी परिवार के फैसलों और क्रियाकलापों पर अपनी राय जाहिर करने की ये हिम्मत कांग्रेसियों में आई कहां से? कांग्रेस के बड़े लीडरों में शुमार कोई भी नाम आप याद कीजिए, किसी ने कभी भी गांधी खानदान के खिलाफ आवाज नही उठाई। और अगर उठाई तो कांग्रेस के अन्य नेताओं ने झुंड बना कर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। गांधी परिवार निर्विवाद कांग्रेस का नेतृत्व करता रहा। जमीनी नेताओं की भीड़ के बीच भी कांग्रेस में वोट इकट्ठा करने की कूव्वत गांधी परिवार के पास ही मानी जाती रही। कांग्रेस में इस बात को लगभग हर कोई मानता था कि सत्ता अगर कोई दिला सकता है तो वो गांधी खानदान ही हैं।

दरअसल कांग्रेस चलती ही अधिनायकवाद पर है। इतिहास गवाह है कि जवाहर लाल नेहरू से ले कर सोनिया-राहुल तक का अपना एक करिश्मा रहा है। पर अब ये करिश्मा टूट रहा हैं। इससे कांग्रेस में  भारी कोहराम मचा है। एकतरफ नटवर सिंह ने सोनिया गांधी के आभामंडल को निशाने पर लिया हैं। दूसरी तरफ राहुल की लगातार चुनावी नाकामी से कांग्रेसियों में भारी बेचैनी हैं। याद किजीए 2008 में जब कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते, राहुल को पी एम पद का मैटिरियल बताया था। तब कैसे सभी कांग्रेसी नेताओं की बाछें खिल गई थी। पर 2004 से राजनीति में कदम रखने वाले राहुल पिछले दस सालों में कुछ खास कमाल नही कर सके। राहुल की लीडरशिप पर सवालिया निशान तो 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में ही लगने शुरू हो गए थे । राहुल इन चुनावों में मुख्य भूमिका में थे पर 403 में से कांग्रेस कुल 22 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। अगला विधानसभा चुनाव 2012 में सीधे साधे राहुल की लीडरशिप में लड़ा गया। राहुल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। पूरे उत्तर प्रदेश में 200 से ज्यादा रैलियां की एंग्री-यंग-मैन की छवि बनाने के लिए बाहों की आस्तीन ऊपर चढ़ाई, कागज फाड़ कर हवा में उछाले पर कुछ काम ना आया। पिछली बार से सिर्फ 6 सीटें ही ज्यादा मिल पाई यानि कुल 28, यहां तक की उनकी अपनी परम्परागत सीट अमेठी की 15 विधानसभा सीटों में से कुल 2 पर ही जीत मिल सकी। हलांकि 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यूपी में 21 सीटें जीत कर ठीक ठाक प्रर्दशन किया, पर कांग्रेसियों के मन में राहुल को लेकर संदेह पैदा हो गया।

2013 में राहुल को कांग्रेस का उपाध्क्ष बना कर औपचारिक रूप से उनका राज्याभिषेक कर दिया गया। कांग्रेस जीतती तो 2014 में प्रधानमंत्री राहुल ही होते। 2014 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेसियों के इस डर को यकीन में बदल दिया कि अगर राहुल नेता रहे तो कांग्रेस का नसीब सत्ता से रूठा रहेगा। हताशा का आलम ये था कि लोकसभा चुनावों में हार के तुरंत बाद, मिलिंद देवड़ा जैसे युवा नेता जो कभी समान्य काम काज के लिए भी राहुल के इशारों का इंतजार करते थे। राहुल की इर्द गिर्द के नेताओं पर निशाना साधने लगें।  

यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस के अधिनायकवाद से चिपके रहने की सबसे बड़ी वजह सत्ता प्राप्ति ही थी। सोनिया अपने राजनीतिक कैरियर के अंतिम पड़ाव पर है और राहुल के रूप में जो नया नायक बचा है, उससे कांग्रेसीयों को बहुत कम उम्मीद हैं। कांग्रेसियों की पूरी आशाऐँ अब बस प्रियंका गांधी पर ही टिकीं है। कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने ये कह कर इस पर मोहर लगा दी है कि कार्यकर्त्ता तीनों गांधियों को राजनीति में देखना चाहते है। बाकि दोनो गांधी-सोनिया और राहुल तो पहले से ही सक्रिय राजनीति में हैं। तो फिर यह कहने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी। कांग्रेस के अंदर उठा प्रियंका प्रियंका का शोर अब एक शक्ल लेने लगा है। ये आम सहमति बनती जा रही है कि प्रियंका को आगे लाया जाना चाहिए और उन्हें बड़ी जिम्म्दारी दी जानी चाहिए। पर सोनिया शायद इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नही है। पूरी कांग्रेस से इतर वो अभी भी राहुल पर दांव लगाना चाहती हैं। राहुल कांग्रेस के सर्वमान्य नेता बने इसके लिए सोनिया पूरा जोर लगा रही है। 10 सालों से संसद में ना के बराबर बोलने वाले राहुल अचानक संसद की वेल में कूद कर नारे क्यों लगाने लगते है। इस बात का अर्थ समझना मुश्किल नही हैं। 

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने बहुत बुरा वक्त झेला है। कई बार चुनाव हारा, कई बार पार्टी का विभाजन हुआ। कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़ कर गए। इंदिरा-राजीव जैसे पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की हत्या हुई। इमरजेंसी के बाद जनता की घृणा झेली, हर बार पार्टी ने इन झंझावातों का सामना किया और पहले से मजबूत हो कर उभरी। कांग्रेस जैसी पार्टी का यूं डूबना देश हित में नही हैं। राहुल हो, प्रिंयका हो या फिर कोई ओर, पार्टी को एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पार्टी की लीडरशिप कांग्रेस के खोये गौरव को फिर से हासिल करने की पहल करेगी। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय फलक पर उभरने के बाद नयी राजनीति का जो दौर भारत में आया है उस में एक मजबूत राजनितिक प्लान ही कांग्रेस की नैया पार लगा सकता है। केवल संसद में नारेबाजी और शोरशराबे से इसे हासिल नही किया जा सकता। 

Friday, August 1, 2014

हाई कमान संस्कृति में जकड़ी आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी ने महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, झारखंड और हरियाणा में चुनाव ना लड़ने का फैसला किया है। वह सिर्फ दिल्ली में ही पूरे दम से चुनाव मैदान में उतरेगी साथ ही पंजाब के उपचुनाव में भी हिस्सा लेगी। चुनाव से बाहर रहने का फैसला लेना या ना लेना किसी भी पार्टी का अंदरूनी मामला होता है। पर पार्टी के फैसला लेने के तरीके ने आम आदमी पार्टी को भी उसी हाई कमांड संस्कृति वाली पार्टीयों की कतार में खड़ा कर दिया है। जिसका आम आदमी पार्टी पुरजोर विरोध करती रही है।

अरविंद केजरीवाल ने कई बार इस बात की दुहाई दी है कि उनकी पार्टी हाई कमांड संस्कृति में विश्वास नही रखती। यहां तक कि पार्टी की वेब साइट के उस हिस्से में, जहां आम आदमी पार्टी को दूसरी पार्टीयों से अलग बताया गया है सबसे पहले यही बात लिखी है। बकौल वेब साइट AAP में कोई भी केंद्रीय आला कमान नही हैं। पर ये दावा कुछ बेदम सा लगता है क्योंकि AAP में भी आला कमान होने के सकेंत साफ नजर आने लगें है।

पहला सकेंत तो AAP की 49 दिन की दिल्ली में सरकार के वक्त ही मिल गया था। अचानक इस्तीफे की घोषणा कर अरविंद केजरीवाल ने सबको अवाक कर दिया। याद करियें दिसंबर-2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव बस हुए ही थे। किसी भी पार्टी से ना समर्थन लेगें ना समर्थन देगेंये नारा लगाने के चंद दिनों के अंदर ही अरविंद केजरीवाल ने कैसे दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जनमत संग्रह शुरू कर दिया। कॉसेप्ट नया था जनता उत्सुक थी। अपने ही कार्यकर्ताओं और वोटरों से बात कर आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को तैयार हो गई। 49 दिन सरकार चली भी, पर इस बार इस्तीफा देने से पहले अरविंद एंड पार्टी ने किसी से राय पूछने की जहमत तक नही उठाई। खैर बाद में गलती की माफी भी मांग ली गई पर देर हो चुकी थी।  

दूसरा संकेत मिला 2014 के लोकसभा चुनावों में, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे कद्दावर नेता लोकसभा की बस उतनी ही सीटें लड़ना चाहते थे, जितनी आम आदमी पार्टी की हैसियत थी। मतलब जहां जहां संगठन मजबूत था सिर्फ वहां वहां। पर अरविंद इससे सहमत नही थे। और क्योंकि AAP में आला कमान सिर्फ अरविंद ही है, इसलिए चली भी उन्हीं की। प्रधानमंत्री की कुर्सी बस चंद कदम ही दूर लग रही थी और देश की 432 लोकसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी चुनावों में कूद पड़ी। तर्क ये था कि हम देश में चुनाव लड़ने नही आये हम तो सेवा करने आये है। ये चुनाव तो जनता का है अगर जीतेगी तो जनता और हारेगी तो भी जनता। AAP का क्या हाल हुआ ये हम सब जानते है। 96% उम्मीदवार जमानत भी ना बचा सके। पार्टी के ज्यादातर वरिष्ठ नेता भी चुनाव हार गए।

अब हरियाणा सहित चार राज्यों में चुनाव ना लड़ने के फैसले ने पार्टी के भीतर हाई कमांड की मौजूदगी पर मुहर लगा दी है। कभी जनमत संग्रह कर अपने फैसले करने वाली पार्टी ने हरियाणा के 95% कार्यकर्ताओं की भावनाओं को दरकिनार कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। कहा ये जा रहा है कि हरियाणा प्रदेश की AAP राज्य कमेटी ने ही चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। और उन्ही की तरफ से आये चुनाव ना लड़ने के प्रस्ताव पर ये फैसला लिया गया।

AAP हरियाणा की तरफ से आये प्रस्ताव पर गौर फरमाइये। इसमें साफ कहा गया है कि 95% वॉलेंयिटर चुनाव लड़ने के पक्ष में थे। चुनाव लड़ा जाये कि नही इस पर बकायदा वॉलेंयिटरस की राय ली गई थी। जिसमें केंद्रीय ऑब्जर्वर भी शामिल हुए। इस राय को 10 जुलाई को हुई AAP की PAC यानि पॉलिटिकल अफेयर कमेटी में पेश किया गया। हफ्ते भर मसला आला कमान, PAC, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राज्य कमेटी के बीच झूलता रहा। 18 जुलाई को फिर से हुई PAC की बैठक में ये कहा गया कि खासतौर पर राष्ट्रीय संयोजक (अरविंद केजरीवाल) की सहमति के बिना हरियाणा में चुनाव लड़ना व्यवहारिक नही होगा। इस शब्द खासतौर पर खास ध्यान देने की जरूरत है। अरविंद की राय 95% वॉलेंयिटरस की उम्मीदों पर भारी पड़ी।

प्रस्ताव के आखिरी में लिखी चंद लाईने AAP में हाई कमान संस्कृति को पूरी तरह से नंगा कर देती है। इन्हें जस का तस प्रस्ताव से लिया गया है। ऐसे में आम आदमी पार्टी, हरियाणा की राज्य कार्यकारिणी की भारी मन से यह राय है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की पूरी सहमति के बिना चुनाव लड़ने का कोई औचित्य नही रह जाता यहां राष्ट्रीय नेतृत्व का मतलब अरविंद केजरीवाल से है यह बताने की कोई जरूरत नही।

यहां महत्वपूर्ण यह है कि क्यों, आम आदमी पार्टी ने अपनी लीक से हट कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। AAP नेता इसे पुरानी गलतियों से लिया गया सबक बता रहे है। पर बात कहीं ज्यादा गहरी है, दरअसल पूरी आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के इर्द गिर्द घूमती है। इसमें कुछ बुराई भी नही पर पार्टी जब शीर्ष नेतृत्व की स्वार्थ साधना का औजर बनने लगती है तो उसके दुषपरिणाम नजर आने लगते हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाहत में पहले भी अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का इस्तेमाल कर चुके है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की पूरी ताकत केजरीवाल के चुनाव क्षेत्र बनारस में काम कर रही थी। इस बात पर कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी जैसे दिग्गज AAP नेता खुले तौर पर नाराजगी जाहिर कर चुके है।

अरविंद केजरीवाल की नजर अब दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। तो वे पार्टी की पूरी ताकत केवल दिल्ली में झोंक देना चाहते हैं। देश भर के कार्यकर्ताओं को दिल्ली चुनावों पर फोकस करने को कहा गया है। और जाहिर है अगर चार दूसरे राज्यों में भी पार्टी चुनावों में हिस्सा लेगी तो ध्यान बंट जायेगा। ये जरूरी नही कि पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ें, कम सीटों पर भी चुनाव लड़ा जा सकता था। पर पार्टी एक खास राज्य में चुनाव जीतने के लिए बाकि राज्यों में चुनावों का बॉयकाट कर रही है। 

देश में गैर परम्परागत राजनीती का आगाज किया था आम आदमी पार्टी ने। भष्टाचार के खात्में की लड़ाई में बहुत से युवा वैचारिक रूप से उसके साथ जुड़े भी। नये तरह से पार्टी को चलाने की कवायद को लोगों ने खूब सराहा। पर आज आम आदमी पार्टी अपनी ही हाई कमांड कार्यशैली में उलझी दिखाई देती है। अगर पार्टी को देश में अपना स्थान बनाना है तो उसे अपने विचार पर अडिग रहना होगा, अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। फैसलों को लिए जाने वाले तरीकों को पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाना होगा। हाई कमांड संस्कृति को खत्म कर कार्यकर्ताओं की बात गौर से सुननी होगी। और इन सबसे ऊपर पार्टी को अंदरूनी लोकतंत्र बहाल करना होगा नही तो आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल पार्टी