तूफान
अक्सर गुजर जाया करते हैं, पर हुदहुद घंटों तक विशाखापत्तनम् को झकझोरता रहा।
फाइटर प्लेन जैसी आवाज़ वाली हवायें दिल में डर पैदा कर रही थीं। टीन की चादरें
अनगाईडेड मिसाईलों की तरह जहां तहां हमले के लिए निकल पड़ीं। खिड़कियों और दरवाजों
में लगे कांच हवा की मार सह ना सके और धमाकों के साथ टूट कर बिखर गए। आसमान काला
पड़ गया। हवा ने जो कचरा आसमान में पहुंचा दिया था वो गोलियों की तरह विशाखापत्तनम्
पर बरसता रहा। जिस पेड़ ने भी हवाओं का रास्ता रोकना चाहा उसको हवाओं ने जमीन पर
ला पटका। जो पेड़ बचे भी वो भी अधमरी हालात में, पत्तियां तक नौच डाली हुदहुद ने। तूफान
के बीच एक वक्त ऐसा भी आया जब हवाऐं थम गई। सूरज निकल आया। पर ये भी हुदहुद की चाल
भर थी क्योंकि ये वो वक्त था जब “तूफान की आंख” यानि तूफान के सेंटर ने विशाखापत्तनम् को छुआ था। आने वाले चंद घंटे और
भयानक साबित हुए।
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| विनाश की तस्वीरें |
हवायें
थमने के बाद डरे सहमें लोगों ने जब घरों से बाहर झांका। तो हर तरफ बिखरे मलबे ने
उनके कदमों को रोक दिया। कार मोटरसाईकिल तो क्या पैदल तक नही चला जा सकता था। चारो
तरफ उखड़े पड़े विशाल पेड़ों ने रास्ते जाम कर दिये। मेन रोड ही नही गलियों तक में
पहुंच मुश्किल थी। ज्यादातर मोबाईल टॉवर भी ध्वस्त हो चुके थे। लोग अपने ही घरों
में फंस कर रह गए। एक तरह से हुदहुद ने विशाखापत्तनम् के 17 लाख लोगों को हाऊस
अरेस्ट की सजा सुना दी। आंध्र प्रदेश में 46 जिंदगियां लील गया था हुदहुद। 70 हजार
करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान हैं। जब सभी हुदहुद की कैद से आजाद होने को
झटपटा रहे थे। तब रिलायंस JIO के हेड
कंसट्रक्शन मि. राव ने पास के शहर काकीनाडा से पांच पैट्रोल से चलने वाली आरा
मशीने मंगाने की पहल की। काकीनाडा में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की ऑफशोर फैसिलिटी है
इसलिए तुरंत एक्शन हुआ और अगले दिन यानि 14 अक्तूबर को आरा मशीनें विशाखापत्तनम्
पहुंच गई।
रिलायंस
के स्थानीय कर्मचारियों का एक दल बनाया गया और ये वालियंटरस तुरंत काम में जुट गए।
ज्यादातर के पास इस तरह की आरा मशीनों को चलाने का कोई अनुभव नही था। ये मशीनें
इतनी ताकतवर है कि पलक झपकते ही बड़े से बड़े पेड़ के टुकड़े कर डालती हैं। पर
रिलायंस वालियंटरस के लिए अपनी जान से ज्यादा जरूरी था कम्यूनिकेशन का पहला साधन
यानि सड़क खोलना। चूंकि रिलायंस JIO कम्यूनिकेशन
के फील्ड में सबसे तेज़ 4G डाटा सर्विस
देने की तैयारी कर रहा है इसलिए रिलायंस के ये वालियंटरस जानते थे कि कम्यूनिकेशन
कितना महत्वपूर्ण हैं।
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| प्रो. जी एस एन राजू, वाईस चांसरल आंध्रा यूनिवर्सिटी |
जल्द
ही ये खबर शहर में फैल गई कि रिलयंस अपनी विशेष आरा मशीनों से शहर की सफाई में
जुटा है। आंध्रा यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर प्रो. जी एस एन राजू भी उनमें से एक
थे। यूनिवर्सिटी कैम्पस की हालत तो और भी खस्ता थी। 50 हजार से ज्यादा पेड़ जमीन
सूंध रहे थे। सैकड़ों गिरे पेड़ों ने कैम्पस की सड़को को बंद कर रखा था। हुदहुद ने
आंध्रा यूनिवर्सिटी को एक खुले कबाड़गाह में तब्दील कर दिया था। पहले दो दिन तो
पैदल भी यूनिवर्सिटी गेट तक नही पहुंचा जा सकता था। शहर की बिजली बंद थी। इसलिए
कैम्पस में मौजूद एकमात्र आरा मशीन जो बिजली से चलती थी बेकार पड़ी थी। प्रो. राजू
ने 15 अक्तूबर को रिलायंस से मदद मांगी और 16 अक्तूबर को रिलायंस के वालियंटर अपनी
5 आरा मशीनों के साथ कैम्पस की सफाई के लिए मौजूद थे। पेड़ हटने से रास्ता बना तो JCB और ट्रक भी अंदर आ पाये
और काम ने तेजी पकड़ी। “रिलायंस
की इस नई सोच ने हमें भी प्रेरित किया इसलिए ही हम इतनी जल्दी कैम्पस खोल पायें” यूनिवर्सिटी
रजिस्टरार प्रो के आर एम राव ने बड़े खुले दिल से ये बात कही।
| GVMC कमीशनर कु. जानकी को पॉवर आरा मशीनें सौपीं गई |
रिलायंस
द्वारा मंगाई गई मशीने इतनी कारगार साबित हो रही थी कि लोकल प्रशासन ने भी रिलायंस
से मदद की गुहार लगाई। सड़कों पर रूकावट होने की वजह से जरूरी सामान की किल्लत हो
गई। दूध, सब्जियां, खाने पीने की चीजें, पैट्रोल कुछ भी विशाखापत्तनम् नही पहुंच
पा रहा था। स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए रिलायंस ने तुंरत 100 आरा मशीनों का
ऑर्डर दे दिया। 24 घंटों से भी कम समय में ना केवल नई मशीने खरीदी गई, उन्हें
विशाखापत्तनम् तक पहुंचाया गया। बल्कि उन्हें विशाखापत्तनम् की म्यूनिसिपल कमीशनर
को सौंप भी दिया गया। हम जिंदगी की अहमियत समझते है इसीलिए ये काम हम इतनी तेजी से
कर सके। ये कहते हुए रिलायंस के हेड कंसट्रक्शन मि. राव की आंखों में चमक आ गई।
उधर
विशाखापत्तनम् के चिड़ियाघर में हालात बहुत बुरे बने हुए थे। 600 एकड़ में फैला है ये विशाल चिड़ियाघर। जानवरों के कुछ बाड़े बिलकुल
तबाह हो गए। बटरफ्लाई ग्रीन हाऊस में एक भी तितली जिंदा नही बची। हुदहुद तूफान की
तेज हवाओं और बारिश को वो झेल ना सकीं। दलपति (हिप्पो) के बाड़े की दीवार ढ़ह गई।
चार जहरीले पॉयथन भी मौका देखकर भाग निकले। पर सबसे बड़ी मुश्किल आ रही थी जानवरों
तक खाना पहुंचाने की। गूंगे जानवर बस शोर मचा सकते थे और आदमी उन से भी ज्यादा
असहाय था। हजारों पेड़ जो पड़े थे,
जानवरों और ज़ू कर्मचारियों के बीच। अन्य
संस्थानों की तरह ज़ू के केयरटेकर की सहायता की अपील भी रिलायंस ठुकरा ना सका और
करीब 8 आरा मशीनें ज़ू कर्मचारियों को सुपुर्द कर दी गई। ज़ू की पूरी तरह सफाई में
तो अभी महीनों लगेगें पर राहत की बात यह है कि सभी बेजुबानों को वक्त पर खाना मिल
रहा है।
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| गनपति (हिप्पो) खाना खा कर खुश है। |
हुदहुद
के हमले से विशाखापत्तनम् कुछ देर के लिए डर जरूर गया था। पर उसने मोर्चा नही
छोड़ा। शहर ने जीने का हौंसला बनाये रखा। सरकार की मदद से जल्द ही स्तिथियों पर
काबू कर लिया गया। सड़कों को साफ कर दिया गया। पीड़ितों को रसद मिली। बिजली दोबारा
चालू हुई। बाजार खुल गए, जरूरी सामान मिलने लगा। पूरे शहर ने एक प्रशिक्षित कमांडो
की तरह मुकाबला किया। यहां तक कि सरकार की एक अपील पर पूरे विशाखापत्तनम् में दीवाली
पर एक पटाखा तक नही छोड़ा गया। क्योंकि सड़क किनारे पड़ी सूखी पत्तियां, टहनियां
और पेड़ों में आग लग जाने का खतरा था।
इस
तूफान में 20 लाख के करीब पेड़ों ने दम तोड़ दिया। अब सबसे बड़ी चुनौती है
विशाखापत्तनम् को फिर से हरा भरा बनाना। सरकार 10 नवम्बर से इसके लिए अभियान
चलायेगी। यूनिवर्सिटी ने भी 50 हजार नए पेड़ लगाने का फैसला लिया है। आईये हम भी
प्रण ले कि पेड़ो को ना नुकसान पहुंचाएगें और जो नुकसान पहुचाने की कोशिश करेगा
उसको रोकेंगे क्योंकि बिना पेड़ों के ये दुनिया बहुत डरावनी लगती है।




















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