Friday, August 1, 2014

हाई कमान संस्कृति में जकड़ी आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी ने महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, झारखंड और हरियाणा में चुनाव ना लड़ने का फैसला किया है। वह सिर्फ दिल्ली में ही पूरे दम से चुनाव मैदान में उतरेगी साथ ही पंजाब के उपचुनाव में भी हिस्सा लेगी। चुनाव से बाहर रहने का फैसला लेना या ना लेना किसी भी पार्टी का अंदरूनी मामला होता है। पर पार्टी के फैसला लेने के तरीके ने आम आदमी पार्टी को भी उसी हाई कमांड संस्कृति वाली पार्टीयों की कतार में खड़ा कर दिया है। जिसका आम आदमी पार्टी पुरजोर विरोध करती रही है।

अरविंद केजरीवाल ने कई बार इस बात की दुहाई दी है कि उनकी पार्टी हाई कमांड संस्कृति में विश्वास नही रखती। यहां तक कि पार्टी की वेब साइट के उस हिस्से में, जहां आम आदमी पार्टी को दूसरी पार्टीयों से अलग बताया गया है सबसे पहले यही बात लिखी है। बकौल वेब साइट AAP में कोई भी केंद्रीय आला कमान नही हैं। पर ये दावा कुछ बेदम सा लगता है क्योंकि AAP में भी आला कमान होने के सकेंत साफ नजर आने लगें है।

पहला सकेंत तो AAP की 49 दिन की दिल्ली में सरकार के वक्त ही मिल गया था। अचानक इस्तीफे की घोषणा कर अरविंद केजरीवाल ने सबको अवाक कर दिया। याद करियें दिसंबर-2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव बस हुए ही थे। किसी भी पार्टी से ना समर्थन लेगें ना समर्थन देगेंये नारा लगाने के चंद दिनों के अंदर ही अरविंद केजरीवाल ने कैसे दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जनमत संग्रह शुरू कर दिया। कॉसेप्ट नया था जनता उत्सुक थी। अपने ही कार्यकर्ताओं और वोटरों से बात कर आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को तैयार हो गई। 49 दिन सरकार चली भी, पर इस बार इस्तीफा देने से पहले अरविंद एंड पार्टी ने किसी से राय पूछने की जहमत तक नही उठाई। खैर बाद में गलती की माफी भी मांग ली गई पर देर हो चुकी थी।  

दूसरा संकेत मिला 2014 के लोकसभा चुनावों में, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे कद्दावर नेता लोकसभा की बस उतनी ही सीटें लड़ना चाहते थे, जितनी आम आदमी पार्टी की हैसियत थी। मतलब जहां जहां संगठन मजबूत था सिर्फ वहां वहां। पर अरविंद इससे सहमत नही थे। और क्योंकि AAP में आला कमान सिर्फ अरविंद ही है, इसलिए चली भी उन्हीं की। प्रधानमंत्री की कुर्सी बस चंद कदम ही दूर लग रही थी और देश की 432 लोकसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी चुनावों में कूद पड़ी। तर्क ये था कि हम देश में चुनाव लड़ने नही आये हम तो सेवा करने आये है। ये चुनाव तो जनता का है अगर जीतेगी तो जनता और हारेगी तो भी जनता। AAP का क्या हाल हुआ ये हम सब जानते है। 96% उम्मीदवार जमानत भी ना बचा सके। पार्टी के ज्यादातर वरिष्ठ नेता भी चुनाव हार गए।

अब हरियाणा सहित चार राज्यों में चुनाव ना लड़ने के फैसले ने पार्टी के भीतर हाई कमांड की मौजूदगी पर मुहर लगा दी है। कभी जनमत संग्रह कर अपने फैसले करने वाली पार्टी ने हरियाणा के 95% कार्यकर्ताओं की भावनाओं को दरकिनार कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। कहा ये जा रहा है कि हरियाणा प्रदेश की AAP राज्य कमेटी ने ही चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। और उन्ही की तरफ से आये चुनाव ना लड़ने के प्रस्ताव पर ये फैसला लिया गया।

AAP हरियाणा की तरफ से आये प्रस्ताव पर गौर फरमाइये। इसमें साफ कहा गया है कि 95% वॉलेंयिटर चुनाव लड़ने के पक्ष में थे। चुनाव लड़ा जाये कि नही इस पर बकायदा वॉलेंयिटरस की राय ली गई थी। जिसमें केंद्रीय ऑब्जर्वर भी शामिल हुए। इस राय को 10 जुलाई को हुई AAP की PAC यानि पॉलिटिकल अफेयर कमेटी में पेश किया गया। हफ्ते भर मसला आला कमान, PAC, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राज्य कमेटी के बीच झूलता रहा। 18 जुलाई को फिर से हुई PAC की बैठक में ये कहा गया कि खासतौर पर राष्ट्रीय संयोजक (अरविंद केजरीवाल) की सहमति के बिना हरियाणा में चुनाव लड़ना व्यवहारिक नही होगा। इस शब्द खासतौर पर खास ध्यान देने की जरूरत है। अरविंद की राय 95% वॉलेंयिटरस की उम्मीदों पर भारी पड़ी।

प्रस्ताव के आखिरी में लिखी चंद लाईने AAP में हाई कमान संस्कृति को पूरी तरह से नंगा कर देती है। इन्हें जस का तस प्रस्ताव से लिया गया है। ऐसे में आम आदमी पार्टी, हरियाणा की राज्य कार्यकारिणी की भारी मन से यह राय है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की पूरी सहमति के बिना चुनाव लड़ने का कोई औचित्य नही रह जाता यहां राष्ट्रीय नेतृत्व का मतलब अरविंद केजरीवाल से है यह बताने की कोई जरूरत नही।

यहां महत्वपूर्ण यह है कि क्यों, आम आदमी पार्टी ने अपनी लीक से हट कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। AAP नेता इसे पुरानी गलतियों से लिया गया सबक बता रहे है। पर बात कहीं ज्यादा गहरी है, दरअसल पूरी आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के इर्द गिर्द घूमती है। इसमें कुछ बुराई भी नही पर पार्टी जब शीर्ष नेतृत्व की स्वार्थ साधना का औजर बनने लगती है तो उसके दुषपरिणाम नजर आने लगते हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाहत में पहले भी अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का इस्तेमाल कर चुके है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की पूरी ताकत केजरीवाल के चुनाव क्षेत्र बनारस में काम कर रही थी। इस बात पर कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी जैसे दिग्गज AAP नेता खुले तौर पर नाराजगी जाहिर कर चुके है।

अरविंद केजरीवाल की नजर अब दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। तो वे पार्टी की पूरी ताकत केवल दिल्ली में झोंक देना चाहते हैं। देश भर के कार्यकर्ताओं को दिल्ली चुनावों पर फोकस करने को कहा गया है। और जाहिर है अगर चार दूसरे राज्यों में भी पार्टी चुनावों में हिस्सा लेगी तो ध्यान बंट जायेगा। ये जरूरी नही कि पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ें, कम सीटों पर भी चुनाव लड़ा जा सकता था। पर पार्टी एक खास राज्य में चुनाव जीतने के लिए बाकि राज्यों में चुनावों का बॉयकाट कर रही है। 

देश में गैर परम्परागत राजनीती का आगाज किया था आम आदमी पार्टी ने। भष्टाचार के खात्में की लड़ाई में बहुत से युवा वैचारिक रूप से उसके साथ जुड़े भी। नये तरह से पार्टी को चलाने की कवायद को लोगों ने खूब सराहा। पर आज आम आदमी पार्टी अपनी ही हाई कमांड कार्यशैली में उलझी दिखाई देती है। अगर पार्टी को देश में अपना स्थान बनाना है तो उसे अपने विचार पर अडिग रहना होगा, अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। फैसलों को लिए जाने वाले तरीकों को पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाना होगा। हाई कमांड संस्कृति को खत्म कर कार्यकर्ताओं की बात गौर से सुननी होगी। और इन सबसे ऊपर पार्टी को अंदरूनी लोकतंत्र बहाल करना होगा नही तो आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल पार्टी

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