पहला सकेंत तो AAP की 49 दिन की दिल्ली में सरकार के
वक्त ही मिल गया था। अचानक इस्तीफे की घोषणा कर अरविंद केजरीवाल ने सबको अवाक कर
दिया। याद करियें दिसंबर-2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव बस हुए ही थे। ‘किसी भी पार्टी से ना समर्थन लेगें ना समर्थन देगें’ ये नारा लगाने के चंद दिनों के अंदर ही अरविंद केजरीवाल ने कैसे
दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जनमत संग्रह शुरू कर दिया। कॉसेप्ट नया था जनता
उत्सुक थी। अपने ही कार्यकर्ताओं और वोटरों से बात कर आम आदमी पार्टी सरकार बनाने
को तैयार हो गई। 49 दिन सरकार चली भी, पर इस बार इस्तीफा देने से पहले अरविंद एंड
पार्टी ने किसी से राय पूछने की जहमत तक नही उठाई। खैर बाद में गलती की माफी भी
मांग ली गई पर देर हो चुकी थी।
अब हरियाणा सहित चार राज्यों में चुनाव ना लड़ने के फैसले ने
पार्टी के भीतर हाई कमांड की मौजूदगी पर मुहर लगा दी है। कभी जनमत संग्रह कर अपने
फैसले करने वाली पार्टी ने हरियाणा के 95% कार्यकर्ताओं की भावनाओं को दरकिनार
कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। कहा ये जा रहा है कि हरियाणा प्रदेश की AAP राज्य कमेटी ने ही चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। और उन्ही की
तरफ से आये चुनाव ना लड़ने के प्रस्ताव पर ये फैसला लिया गया।
प्रस्ताव के आखिरी में लिखी चंद लाईने AAP में हाई कमान संस्कृति को पूरी तरह से नंगा कर देती है। इन्हें
जस का तस प्रस्ताव से लिया गया है। “ऐसे में आम आदमी पार्टी, हरियाणा की
राज्य कार्यकारिणी की भारी मन से यह राय है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की पूरी सहमति के
बिना चुनाव लड़ने का कोई औचित्य नही रह जाता”। यहां राष्ट्रीय नेतृत्व का मतलब अरविंद केजरीवाल से है यह बताने
की कोई जरूरत नही।
यहां महत्वपूर्ण यह है कि क्यों, आम आदमी पार्टी ने अपनी लीक से
हट कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। AAP नेता इसे पुरानी गलतियों से लिया गया
सबक बता रहे है। पर बात कहीं ज्यादा गहरी है, दरअसल पूरी आम आदमी पार्टी अरविंद
केजरीवाल के इर्द गिर्द घूमती है। इसमें कुछ बुराई भी नही पर पार्टी जब शीर्ष
नेतृत्व की स्वार्थ साधना का औजर बनने लगती है तो उसके दुषपरिणाम नजर आने लगते
हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाहत में पहले भी अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का
इस्तेमाल कर चुके है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की पूरी ताकत केजरीवाल के
चुनाव क्षेत्र बनारस में काम कर रही थी। इस बात पर कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी
जैसे दिग्गज AAP नेता खुले तौर पर नाराजगी जाहिर कर चुके है।
देश में गैर परम्परागत राजनीती का आगाज किया था आम
आदमी पार्टी ने। भष्टाचार के खात्में की लड़ाई में बहुत से युवा वैचारिक रूप से
उसके साथ जुड़े भी। नये तरह से पार्टी को चलाने की कवायद को लोगों ने खूब सराहा।
पर आज आम आदमी पार्टी अपनी ही हाई कमांड कार्यशैली में उलझी दिखाई देती है। अगर
पार्टी को देश में अपना स्थान बनाना है तो उसे अपने विचार पर अडिग रहना होगा, अपनी
कार्यशैली बदलनी होगी। फैसलों को लिए जाने वाले तरीकों को पारदर्शी और वैज्ञानिक
बनाना होगा। हाई कमांड संस्कृति को खत्म कर कार्यकर्ताओं की बात गौर से सुननी होगी।
और इन सबसे ऊपर पार्टी को अंदरूनी लोकतंत्र बहाल करना होगा नही तो आम आदमी पार्टी,
अरविंद केजरीवाल पार्टी




No comments:
Post a Comment