राहुल गांधी संसद के वेल में पहुंचे नहीं कि खबर बन गई। कांग्रेसी
सांसदों के साथ मिल कर राहुल ने खूब नारेबाजी की। दस साल तक लोकसभा में सत्ता की
बेंचों पर सुख की बंसी बजाते हुए राहुल ने बहुत कम ही संसद की बहसों में हिस्सा
लिया
था। फिर ऐसा क्या हो गया कि राहुल को अपने खोल से बाहर निकल कर शोरगुल और नारेबाजी
का सहारा लेना पड़ा। दरअसल लोकसभा में करारी हार के बाद कांग्रेस की हालत पस्त है।
गांधी परिवार पर अंदर और बाहर हर तरफ से हमले हो रहे हैं। नैशनल हेराल्ड की सम्पत्ति के
अवैध इस्तेमाल का मामला कोर्ट में है। उधर सोनिया प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनी, इस
बात का खुलासा कर गांधी खानदान के पुराने वफादार नटवर सिंह ने सोनिया के आभामंडल
को नौंच खसौंट कर रख दिया है। प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद बनी त्याग की मूर्ति
वाली छवि को नटवर ने तहस नहस कर दिया। नैतिकता की जो डोर सोनिया ने मजबूती से थाम
रखी थी, उस को काटने की पूरी कोशिश नटवर ने अपनी किताब में की है। हलांकि सोनिया
ने अपनी तरफ से भी किताब लिखने की घोषणा कर आग में पानी डालने की कोशिश जरूर की है,
पर जो नुकसान होना था हो चुका।
राज्यों में भी कांग्रेसियों की हालात बिना जनरल के अधमरी सेना जैसी होती जा रही है। हरियाणा में कांग्रेस के बड़े नेता बीरेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। असम के स्वस्थय मंत्री हेमंत विश्व सरमा ने मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। महाराष्ट्र में आला नेताओं की खींचतान के बीच कोकंण के कद्दावर नेता नारायण राणे पार्टी से इस्तीफा दे कर दोबारा पार्टी में अनमने मन से लौट चुके है। सहयोगी दलो के साथ भी रिश्तों में अब वो गर्मजोशी दिखाई नही देती। एनसीपी की लगातार धमकियों के बावजूद महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन बचाने के लिए कांग्रेस को झुकना पड़ा। एनसीपी ने पिछले चुनावों के मुकाबले आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने कोटे से दस सीटें ज्यादा हड़प ली। नेशनल कॉफ्रेंस ने भी आगामी जम्मू कश्मीर चुनावो में कांग्रेस से पल्ला झाड़ लिया है।
गांधी परिवार के फैसलों और क्रियाकलापों पर अपनी राय जाहिर करने की ये
हिम्मत कांग्रेसियों में आई कहां से? कांग्रेस के बड़े लीडरों में शुमार कोई भी नाम
आप याद कीजिए, किसी ने कभी भी गांधी खानदान के खिलाफ आवाज नही उठाई। और अगर उठाई
तो कांग्रेस के अन्य नेताओं ने झुंड बना कर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। गांधी
परिवार निर्विवाद कांग्रेस का नेतृत्व करता रहा। जमीनी नेताओं की भीड़ के बीच भी कांग्रेस
में वोट इकट्ठा करने की कूव्वत गांधी परिवार के पास ही मानी जाती रही। कांग्रेस
में इस बात को लगभग हर कोई मानता था कि सत्ता अगर कोई दिला सकता है तो वो गांधी
खानदान ही हैं।
2013 में राहुल को कांग्रेस का उपाध्क्ष बना कर औपचारिक रूप से उनका
राज्याभिषेक कर दिया गया। कांग्रेस जीतती तो 2014 में प्रधानमंत्री राहुल ही होते।
2014 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेसियों के इस डर को यकीन में बदल दिया
कि अगर राहुल नेता रहे तो कांग्रेस का नसीब सत्ता से रूठा रहेगा। हताशा का आलम ये
था कि लोकसभा चुनावों में हार के तुरंत बाद, मिलिंद देवड़ा जैसे युवा नेता जो कभी
समान्य काम काज के लिए भी राहुल के इशारों का इंतजार करते थे। राहुल की इर्द गिर्द
के नेताओं पर निशाना साधने लगें।
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने बहुत बुरा वक्त झेला है। कई
बार चुनाव हारा, कई बार पार्टी का विभाजन हुआ। कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़ कर गए।
इंदिरा-राजीव जैसे पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की हत्या हुई। इमरजेंसी के बाद जनता
की घृणा झेली, हर बार पार्टी ने इन झंझावातों का सामना किया और पहले से मजबूत हो
कर उभरी। कांग्रेस जैसी पार्टी का यूं डूबना देश हित में नही हैं। राहुल हो,
प्रिंयका हो या फिर कोई ओर, पार्टी को एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है। उम्मीद की
जानी चाहिए कि पार्टी की लीडरशिप कांग्रेस के खोये गौरव को फिर से हासिल करने की
पहल करेगी। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय फलक पर उभरने के बाद नयी राजनीति का जो दौर
भारत में आया है उस में एक मजबूत राजनितिक प्लान ही कांग्रेस की नैया पार लगा सकता
है। केवल संसद में नारेबाजी और शोरशराबे से इसे हासिल नही किया जा सकता।





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