Friday, August 8, 2014

गांधी खानदान के हाथों फिसलती कांग्रेस


राहुल गांधी संसद के वेल में पहुंचे नहीं कि खबर बन गई। कांग्रेसी सांसदों के साथ मिल कर राहुल ने खूब नारेबाजी की। दस साल तक लोकसभा में सत्ता की बेंचों पर सुख की बंसी बजाते हुए राहुल ने बहुत कम ही संसद की बहसों में हिस्सा लिया
था। फिर ऐसा क्या हो गया कि राहुल को अपने खोल से बाहर निकल कर शोरगुल और नारेबाजी का सहारा लेना पड़ा। दरअसल लोकसभा में करारी हार के बाद कांग्रेस की हालत पस्त है। गांधी परिवार पर अंदर और बाहर हर तरफ से हमले हो रहे हैं। नैशनल हेराल्ड की सम्पत्ति के अवैध इस्तेमाल का मामला कोर्ट में है। उधर सोनिया प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनी, इस बात का खुलासा कर गांधी खानदान के पुराने वफादार नटवर सिंह ने सोनिया के आभामंडल को नौंच खसौंट कर रख दिया है। प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद बनी त्याग की मूर्ति वाली छवि को नटवर ने तहस नहस कर दिया। नैतिकता की जो डोर सोनिया ने मजबूती से थाम रखी थी, उस को काटने की पूरी कोशिश नटवर ने अपनी किताब में की है। हलांकि सोनिया ने अपनी तरफ से भी किताब लिखने की घोषणा कर आग में पानी डालने की कोशिश जरूर की है, पर जो नुकसान होना था हो चुका।

उधर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह की किताब भी मार्केट में आने की संभावना है। किताब मूलरूप से मनमोहन की ईमानदारी और कांग्रेसी नेताओं द्वारा उनकी राह में बिछाये गए कांटो के बारे में होगी। ईशारों में ही सही निशाने पर गांधी खानदान ही होगा। कभी कांग्रेस में बिना गांधी परिवार की मर्जी के एक पत्ता भी नही हिलता था, पर हालात अब बदल रहे हैं। अब तो हर छोटा-बड़ा नेता गांधी परिवार पर निशाना साध रहा है। पंजाब के नेता और कांग्रेस कार्यसमिती के पूर्व सदस्य जगमीत बराड़ ने तो सोनिया और राहुल को दो साल के लिए छुट्टी पर चले जाने की नसीहत दे डाली। आग अभी बुझी भी नही थी कि उन्होंने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की हालत लावारिस कुत्ते के बराबर बता दी।


राज्यों में भी कांग्रेसियों की हालात बिना जनरल के अधमरी सेना जैसी होती जा रही है। हरियाणा में कांग्रेस के बड़े नेता बीरेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। असम के स्वस्थय मंत्री हेमंत विश्व सरमा ने मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। महाराष्ट्र में आला नेताओं की खींचतान के बीच कोकंण के कद्दावर नेता नारायण राणे पार्टी से इस्तीफा दे कर दोबारा पार्टी में अनमने मन से लौट चुके है। सहयोगी दलो के साथ भी रिश्तों में अब वो गर्मजोशी दिखाई नही देती। एनसीपी की लगातार धमकियों के बावजूद महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन बचाने के लिए कांग्रेस को झुकना पड़ा। एनसीपी ने पिछले चुनावों के मुकाबले आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने कोटे से दस सीटें ज्यादा हड़प ली। नेशनल कॉफ्रेंस ने भी आगामी जम्मू कश्मीर चुनावो में कांग्रेस से पल्ला झाड़ लिया है।

कल तक गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना कोई कांग्रेसी कर ही नही कर सकता था। पर आज ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस के भीतर से ही विऱोध के स्वर उठने लगे। विरोध कई स्तर पर है मुखर भी, बौध्दिक भी और कहीं गहरे भी। मुखर विरोध तो कई तरफ से हो रहा है, पर कुछ दूसरे तरह के विरोधों पर भी नजर डालें। कांग्रेस ने जब संसद में इंश्योरेंस बिल को लटकायें रखा। तब वरिष्ठ नेता और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिहं ने इंश्योरेंस बिल पर कांग्रेस को राजनिति से बचने की सलाह दी। उनका मानना है कि इससे कांग्रेस की छवि खराब होगी।

गांधी परिवार के फैसलों और क्रियाकलापों पर अपनी राय जाहिर करने की ये हिम्मत कांग्रेसियों में आई कहां से? कांग्रेस के बड़े लीडरों में शुमार कोई भी नाम आप याद कीजिए, किसी ने कभी भी गांधी खानदान के खिलाफ आवाज नही उठाई। और अगर उठाई तो कांग्रेस के अन्य नेताओं ने झुंड बना कर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। गांधी परिवार निर्विवाद कांग्रेस का नेतृत्व करता रहा। जमीनी नेताओं की भीड़ के बीच भी कांग्रेस में वोट इकट्ठा करने की कूव्वत गांधी परिवार के पास ही मानी जाती रही। कांग्रेस में इस बात को लगभग हर कोई मानता था कि सत्ता अगर कोई दिला सकता है तो वो गांधी खानदान ही हैं।

दरअसल कांग्रेस चलती ही अधिनायकवाद पर है। इतिहास गवाह है कि जवाहर लाल नेहरू से ले कर सोनिया-राहुल तक का अपना एक करिश्मा रहा है। पर अब ये करिश्मा टूट रहा हैं। इससे कांग्रेस में  भारी कोहराम मचा है। एकतरफ नटवर सिंह ने सोनिया गांधी के आभामंडल को निशाने पर लिया हैं। दूसरी तरफ राहुल की लगातार चुनावी नाकामी से कांग्रेसियों में भारी बेचैनी हैं। याद किजीए 2008 में जब कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते, राहुल को पी एम पद का मैटिरियल बताया था। तब कैसे सभी कांग्रेसी नेताओं की बाछें खिल गई थी। पर 2004 से राजनीति में कदम रखने वाले राहुल पिछले दस सालों में कुछ खास कमाल नही कर सके। राहुल की लीडरशिप पर सवालिया निशान तो 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में ही लगने शुरू हो गए थे । राहुल इन चुनावों में मुख्य भूमिका में थे पर 403 में से कांग्रेस कुल 22 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। अगला विधानसभा चुनाव 2012 में सीधे साधे राहुल की लीडरशिप में लड़ा गया। राहुल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। पूरे उत्तर प्रदेश में 200 से ज्यादा रैलियां की एंग्री-यंग-मैन की छवि बनाने के लिए बाहों की आस्तीन ऊपर चढ़ाई, कागज फाड़ कर हवा में उछाले पर कुछ काम ना आया। पिछली बार से सिर्फ 6 सीटें ही ज्यादा मिल पाई यानि कुल 28, यहां तक की उनकी अपनी परम्परागत सीट अमेठी की 15 विधानसभा सीटों में से कुल 2 पर ही जीत मिल सकी। हलांकि 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यूपी में 21 सीटें जीत कर ठीक ठाक प्रर्दशन किया, पर कांग्रेसियों के मन में राहुल को लेकर संदेह पैदा हो गया।

2013 में राहुल को कांग्रेस का उपाध्क्ष बना कर औपचारिक रूप से उनका राज्याभिषेक कर दिया गया। कांग्रेस जीतती तो 2014 में प्रधानमंत्री राहुल ही होते। 2014 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेसियों के इस डर को यकीन में बदल दिया कि अगर राहुल नेता रहे तो कांग्रेस का नसीब सत्ता से रूठा रहेगा। हताशा का आलम ये था कि लोकसभा चुनावों में हार के तुरंत बाद, मिलिंद देवड़ा जैसे युवा नेता जो कभी समान्य काम काज के लिए भी राहुल के इशारों का इंतजार करते थे। राहुल की इर्द गिर्द के नेताओं पर निशाना साधने लगें।  

यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस के अधिनायकवाद से चिपके रहने की सबसे बड़ी वजह सत्ता प्राप्ति ही थी। सोनिया अपने राजनीतिक कैरियर के अंतिम पड़ाव पर है और राहुल के रूप में जो नया नायक बचा है, उससे कांग्रेसीयों को बहुत कम उम्मीद हैं। कांग्रेसियों की पूरी आशाऐँ अब बस प्रियंका गांधी पर ही टिकीं है। कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने ये कह कर इस पर मोहर लगा दी है कि कार्यकर्त्ता तीनों गांधियों को राजनीति में देखना चाहते है। बाकि दोनो गांधी-सोनिया और राहुल तो पहले से ही सक्रिय राजनीति में हैं। तो फिर यह कहने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी। कांग्रेस के अंदर उठा प्रियंका प्रियंका का शोर अब एक शक्ल लेने लगा है। ये आम सहमति बनती जा रही है कि प्रियंका को आगे लाया जाना चाहिए और उन्हें बड़ी जिम्म्दारी दी जानी चाहिए। पर सोनिया शायद इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नही है। पूरी कांग्रेस से इतर वो अभी भी राहुल पर दांव लगाना चाहती हैं। राहुल कांग्रेस के सर्वमान्य नेता बने इसके लिए सोनिया पूरा जोर लगा रही है। 10 सालों से संसद में ना के बराबर बोलने वाले राहुल अचानक संसद की वेल में कूद कर नारे क्यों लगाने लगते है। इस बात का अर्थ समझना मुश्किल नही हैं। 

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने बहुत बुरा वक्त झेला है। कई बार चुनाव हारा, कई बार पार्टी का विभाजन हुआ। कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़ कर गए। इंदिरा-राजीव जैसे पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की हत्या हुई। इमरजेंसी के बाद जनता की घृणा झेली, हर बार पार्टी ने इन झंझावातों का सामना किया और पहले से मजबूत हो कर उभरी। कांग्रेस जैसी पार्टी का यूं डूबना देश हित में नही हैं। राहुल हो, प्रिंयका हो या फिर कोई ओर, पार्टी को एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पार्टी की लीडरशिप कांग्रेस के खोये गौरव को फिर से हासिल करने की पहल करेगी। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय फलक पर उभरने के बाद नयी राजनीति का जो दौर भारत में आया है उस में एक मजबूत राजनितिक प्लान ही कांग्रेस की नैया पार लगा सकता है। केवल संसद में नारेबाजी और शोरशराबे से इसे हासिल नही किया जा सकता। 

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