जीत का जश्न और हार
की निराशा थोड़ी कम हुई हो तो एक प्रश्न है। क्या आम आदमी पार्टी इतनी सीटें
डिजर्व करती थी जितनी उन्होंने स्वंय भी कल्पना नही की थी और क्या भारतीय जनता
पार्टी इतनी पिटाई डिजर्व करती थी जितनी उसकी दुर्गति हुई। देश के इतिहास में कभी इस
प्रकार के नतीज़े नही आये। इंदिरा के मौत के बाद राजीव गांधी भी इतनी सीटें नही
जीत पाए थे। जितनी आम आदमी पार्टी की झोली में गिरी। विशालतम राजनीतिक लहर भी कभी
किसी को इतनी सीटें नही दिला पाई। इन असाधारण परिणामों की वजह भी असाधारण ही होनी
चाहिए।
महज़ 6 साल पुरानी
बात है, लोकसभा चुनावों में दिल्ली ने कांग्रेस की झोली 57 प्रतिशत वोटों से भर दी
थी। यहां यह जानना भी जरूरी है कि ये आम आदमी पार्टी को हालिया मिलें 54.3 प्रतिशत
से ये कहीं ज्यादा थे। पहले विधानसभा चुनाव यानी 1993 के बाद से विभन्न चुनावो में
यह 6ठा ऐसा मौका था जब दिल्ली ने एक ही पार्टी को 50 प्रतिशत से ज्यादा मत दिये।
तो दिल्ली पहले भी एकतरफा वोट करती रही है। तो इस बार ऐसा क्या अलग हुआ कि दिल्ली
में कांग्रेस और भाजपा दो अंको में भी नही पहुंच सके।
दरअसल इसकी सबसे बड़ी
वजह रही कांग्रेस का बुरी तरह पिटना। चुनाव दर चुनाव कांग्रेस ने अपना जनाधार खो
रही है। देश की सबसे बड़ी पार्टी के जनाधार खोने की गति भी आश्चार्यजनक रूप से तेज
है। दिल्ली में कांग्रेस लगभग 57 प्रतिशत वोट से 10 प्रतिशत पर पहुंच गई। यानि 6
सालों के भीतर कांग्रेस का 82 फीसदी वोट छिटक गया।
कांग्रेस का दिल्ली में गिरता वोट शेयर
2009 ----57
प्रतिशत
2012
...... 31 प्रतिशत
2013
...... 25 प्रतिशत
2014
...... 15 प्रतिशत
2015
...... 9.7 प्रतिशत
राजनीतिक वातावरण
में कांग्रेस ने एक ऐसा वैक्यूम बना दिया। जिसे भरने को बहुत सी पार्टियां दावेदार
हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह काम भारतीय जनता पार्टी ने किया। सौ प्रतिशत तो नही पर
बहुत बड़ा वर्ग भाजपा की तरफ आकर्षित हुआ। कुछ राज्य स्तरीय दलों को भी इसका फायदा
पहुंचा। भाजपा अपने प्रपंचों में ही उलझी रही और दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस
जनित वैक्यूम को भरने में सफल रही। कांग्रेस से अलग हुआ वोटर अभी अपनी राजनीतिक दिशा
तय नही कर पाया है। कांग्रेस में उसे भविष्य दिखाई नही देता इसलिए अपना वोट बेकार
करने के बजाए वो कई तरह के प्रयोग कर रहा है। 2014 में मोदी के उभार के साथ वो
मोदी को वोट देता है और 2015 में उसे केजरीवाल में नायक दिखाई देता है। यहां एक
बात दीगर है कि ये कांग्रेसी वोटर “अधिनायकवाद
की राजनीति” से निकल कर आया है। इसे आज भी वोट करने के लिए
एक सुपर-हीरो की जरूरत है। जो उसे राष्ट्रीय स्तर पर मोदी
में और दिल्ली के स्तर पर केजरीवाल में दिखाई देता है।
भाजपा के कुछ लोग दावा
कर रहे है कि पिछली विधानसभा के मुकाबले भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत कंसोलिडेट किया
है। पर जनाब जब टेबल पर कांग्रेस के लगभग 82 फीसदी वोट
बटोरनें को पड़े हो तो अपने वोटों पर फोकस करना राजनीतिक आत्महत्या सरीखा ही हैं। भाजपा
के पास इन वोटरों को लुभाने का कोई प्लान नही था। दिल्ली भाजपा के स्थापित चेहरों
को परे हटा कर किरण बेदी को ले आया गया। इससे दो नुकसान हुए पहला भाजपा संगठनात्मक
रूप से कमजोर हुई और दूसरा जिस सुपर हीरो की तलाश में वोटर था वो उसे किरण बेदी के
रूप में नजर नही आया। किरण उसे केजरीवाल की सबोर्डिनेट सरीखी ही ज्यादा लगी। और जब
दोनो एक ही आंदोलन से निकले हो और केजरीवाल का रूतबा ज्यादा हो तो फिर केजरीवाल
क्यों नही। भाजपा लगातार राजनीतिक भूलें करती रही और अरविंद केजरीवाल लगातार अपनी
49 दिनों की सरकार को झाड़ पौंछ कर लोगों के सामने रखते रहे।
भाजपा की हार के और
भी बहुत से कारण गिऩाए जा सकते है मसलन अंहकारी इमेज़, संघ का चुनाव प्रचार में
ठीक से ना जुटना, भाजपा दिल्ली अध्यक्ष सतीश उपध्याय को आखिरी वक्त में किनारे लगा
देना, जिससे भाजपा की सारी जमीनी व्यवस्था बिगाड़ गईं। हर्षवर्धन को सही तरीके से
इस्तेमाल ना करना, दिल्ली की पॉलटिक्स को गुजराती स्टाइल में चलाना वगैरह वगैरह। इनका
भी अपना सीमित महत्व है पर जो पॉलटिकल पार्टी नए राजनीतिक वातावरण में कांग्रेस से
अलग हुए वोटर को साध लेगी वही पार्टी राज करेगी फिर चाहे वो मोदी हो या केजरीवाल।




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