बैडमिंटन सहित कई भारतीय खेलों में ‘नॉन प्लेइंग कैप्टन’ की परम्परा रही
है। जिसमें कैप्टन पर परफॉर्मेंस का कोई दवाब नही रहता था। खिलाड़ी मैदान पर जी
जान लगाते और कैप्टन बाहर से चिल्ला चिल्ला कर खिलाड़ियों का हौंसला बढ़ाया करता।
कप्तान के दोनो हाथो में लड्डू ही लड्डू हुआ करते थे। जीते तो कैप्टन की जीत और
हारे तो खिलाडियों की हार। अरविंद
केजरीवाल ने दिल्ली मंत्रीमंडल में अपने लिए एक ऐसी ही ‘नॉन प्लेइंग
मुख्यमंत्री’ की भूमिका
चुनी है। महत्वपूर्ण तो छोड़िए एक भी विभाग उन्होंने कामकाज के लिए अपने पास नही
रखा। ‘नॉन
प्लेइंग कैप्टन’ की तरह वे
केवल एडमिनिस्ट्रेटिव भूमिका में होगें।
दिल्ली में मुख्यमंत्री समेत कुल सात मंत्री है। 32 मंत्रालय
6 मंत्रियों में बांटे गए हैं। अकेले मनीष सिसौदिया के पास 10 मंत्रालय हैं। इसके
अलावा जो भी मंत्रालय बांटे नही जा सके, उनका काम भी मनीष सिसौदिया ही देखेंगे। केजरीवाल ने
अपने को सिर्फ दूसरे मंत्रियों के कामकाज की निगरानी के लिए रख छोड़ा है। ‘5 साल केजरीवाल’ ये चुनाव अरविंद
केजरीवाल के नाम पर लड़ा गया था। जीतने पर अरविंद ही मुख्यमंत्री बनेगें ये सबको
पता था। पर अरविंद सिर्फ दिखावटी मुख्यमंत्री होगें ये कोई नही जानता था। जो लोग
सरकारी कामकाज की बारीकियां समझते है वे बता सकते है कि दिल्ली का वास्तविक
मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब नही मनीष सिसौदिया साहब हैं। "लीड बॉय एक्ज़ाम्पल"
के बजाए उन्होंने "नॉन प्लेइंग मु्ख्यमंत्री" का खिताब क्यों चुना, ये तो वे ही बेहतर
जानते होगें। पर आम आदमी पार्टी का चुनावी नारा "5 साल मनीष सिसौदिया"
तो कतई नही था।
इसका ये मतलब नही है कि दिल्ली सरकार चलाने की काबलियत मनीष
या बाकी मंत्रियो में नही है। भविष्य अपनी टिप्पणी इस पर जरूर करेगा। उन्हें परखे
जाने की जरूरत है। ये भी उतना ही सच है कि आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय महत्वकांक्षा
है। पर उसके लिए केजरीवाल का दिल्ली के कामकाज से हाथ खींच लेना समझ से परे है।
दूसरा केजरीवाल की छवि एक अराजक राजनेता की छवि रही है। विरोधी ये लेबल उन पर
चस्पा करते ही रहते थे। यदा कदा वो स्वंय भी इस पर मोहर लगाते रहे हैं। दिल्ली की
सरकार एक मौके की तरह आई थी, जब वे अपने को एक बेहतर प्रशासक के रूप में साबित कर सकते थे।
पर लगता है महत्वकात्क्षीं अरविंद कुछ ज्यादा ही जल्दी में हैं। पिछली बार दिल्ली
सरकार से इस्तीफा दे वे अपनी जल्दबाजी का परिणाम भुगत चुके हैं। लगता है पिछली
गल्तियों से कुछ खास नही सीखा अरविंद केजरीवाल ने।
अरविंद की उम्र भी अभी कम है। वे आसानी से अपने को दिल्ली के
दिल में स्थापित कर देश विजय के लिए निकल सकते थे। पर दिल्ली की कप्तानी के लिए
जिस अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने चुना था उसने मैच शुरू होने से पहले ही
अपने आप को अलग कर लिया। जिस देश में प्रधानमंत्री भी ‘नॉन प्लेइंग कैप्टन’ होने की लिबर्टी
नही ले सकता वहां अरविंद दिल्ली को नॉन प्लेइंग मुख्यमंत्री के रूप में चलाएगें।
महत्वकाक्षां का ये खेल थोड़ा खलता है। उम्मीद है आप उम्मीदों पर खरें उतरेगें।
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