Wednesday, August 5, 2015

लाल चड्डी पहलवान और मरखना सांड (संसद पर विशेष)

लाल चड्डी पहन कर सांड के सामने नंगा नाच किसी भी सूरत में अक्लमंदी नही ... पर फिर भी कुछ है जो ऐसा करने से नही चूकते .... और शुरू हो जाती है .... आ सांड मुझे मार वाली जंग ...... वैसे ये बात दीगर है कि सांड और लाल चड्डी पहलवान के बीच होने वाली इस जंग से... ना तो समाज को कोई खास मतलब होता है और ना ही समाज का कोई भला ही हो पाता है  ...डर अलग लगता है
पर फिर भी इस खास तरह की भिड़ंत को महिमामंडित करने वालो की कमी नही .... ये बताने वालो की भी कमी नही कि इस लड़ाई कि कितनी और क्यों जरूरत है .... पर ये लड़ाई हो किस के नाम पर रही है .... इसे समझने के लिए इन बयानबाज़ो के बयानों की बानगी देखिए ... “देश जानना चाहता है” ..... “देश देख रहा है” .... “जनता को मूर्ख नही बनाया जा सकता” इत्यादि इत्यादि। ...... इनकी देश पर दावेदारी या कहे ठेकेदारी इतनी जबर्दस्त है कि अगर इन्होंने कह दिया तो बस समझो देश ने कह दिया।
पहले तो बेचारे आम आदमी को पता ही नही चलता कि ये लाल चड्डी पहलवान कर क्या रहा है .... और इसने ये लाल चड्डी पहन क्यों रखी है। और चलो पहन रखी है तो ये सांड के आगे क्यों नाच रहा है ...... इससे मेरा क्या भला होने वाला है। और फिर ये सांड .... ये लाल चड्डी पहलवान के पीछे क्यों पड़ा है .... लगता है  इसको भी कुछ और काम नही ...... सांड और लाल चड्डी पहलवान आम आदमी यानि उसके नाम पर लड़ाई लड़ रहे हैं ...... ये समझने में ही उसकी उम्र निकल जाती है।
लाल चड्डी पहलवान और सांड बदलते रहते है ... लड़ाई जारी रहती है ..... लड़ाई के गुब्बार में कभी सांड की हुंकार ...तो कभी लाल चड्डी पहलवान की ललकार सुनाई देती है ... संसद के साथ देश दम साधे रिजल्ट का इंतजार करता रहता है .... संसद ठप्प पड़ी रहती है .......देश रूका रहता है.... दूसरी और आम आदमी की जीत तो उसी वक्त तय हो जाती है .... जब लड़ाई शुरू होती है ... क्योकिं जीते कोई भी ....जीत तो आम आदमी को ही समर्पित की जानी है ...बेचारा आम आदमी कितना मूर्ख है अपनी जीत को भी जीत नही मान पाता .... जय जयकार हो लाल चड्डी पहलवानों और सांडों की ...

Friday, July 10, 2015

लाठी वाली विदेश नीति

"चुपचाप रहो पर एक बड़ी लाठी हमेशा अपने पास रखो" दुनिया के बड़े ताकतवर देशों की विदेश नीति लगभग इसी के इर्दगिर्द घूमती है .... यानी खुद कम बोलो लाठी को बोलने दो .... खुद कभी बोलो भी तो दुनिया की तरक्की, शांति और सौहर्द की ही बात करो ..... बाकि का काम लाठी खुद कर लेगी ... पाकिस्तान के मामले में भारत की भी यही पॉलिसी थी।
एक और विदेश नीति है जिसका झंडाबरदार अमेरिका रहा है .... पहले एक कहानी बनाओ .. फिर दुनिया को सुनाओ ..... बिना सबूत दुनिया को मानने पर मजबूर करो ... और अंत में अपनी लाठी लेकर चढाई कर दो .... ईराक में उसने ... वेपन ऑफ मॉस डिस्ट्रक्शन ... की कैसी झूठी कहानी बनाई थी ... ये किसी से झुपा नही है।
मैं इन दो तरह की विदेश नीतियों का जिक्र इस लिए कर रहा हूं कि आजकल पता ही नही चल रहा कि हमारी यानि भारत की विदेश नीति किस दिशा मेें जा रही है .... खासकर पाकिस्तान के मामले में ... लाठी तो अभी भी हमारे पास है ... खूब तेल पिलाई हुई.... और अपन चला भी खूब रहे है ... पर एक बदलाव आया है ... अब हम खूब जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर लाठी घूमा रहे है .....
बर्मा में आंतकवादियों के खिलाफ सेना ने ऑपरेशन क्या किया ... अखबारों में तस्वीरे छपवा दी ....ईशारों में राज्यमंत्री बोले संभल जाए पाकिस्तान .... कभी रक्षा मंत्री पाकिस्तान को धमकाने लगते है .... पाकिस्तान भी पूरा जोर लगा कर रोना शुरू कर देता है .... पाकिस्तान का रोना जो ना कर पाया था ..... हमारी चीख चिल्लाहट के साथ लाठी घूमाने ने वो कर दिखाया ....... दुनिया का ध्यान इस और खिंच रहा है ....
पाकिस्तान पर दवाब बनाना चाहिए इससे कोई इंकार नही ..... वो कई स्तर पर होना चाहिए .... इस से भी इंकार नही ... ईंट का जवाब पत्थर से दें .... कौन मना करता है ... पर इन पर छाती ठोकना ... विदेश नीति का हिस्सा नही हो सकता ....
वाजपेयी जी ने ठीक कहा था कि दोस्त बदले जा सकते है पड़ोसी नही ...20 करोड़ की आबादी वाला पाकिसतान कहीं नही जाने वाला ... हमें साथ रहना है ... यही सच्चाई है ....हमने बांगलादेश की तरक्की के रास्ते तैयार करने की कोशिशे शुरू कर दी हैं ...... इसी तरह हमें तमाम दुश्मनियों के बाद भी पाकिस्तान की तरक्की में मददगार होना होगा...... क्योंकि पाकिस्तान की तरक्की में ही साउथ एशिया की शांति छुपी है

Sunday, February 22, 2015

‘नॉन प्लेइंग मुख्यमंत्री’ – अरविंद केजरीवाल

बैडमिंटन सहित कई भारतीय खेलों में नॉन प्लेइंग कैप्टन की परम्परा रही है। जिसमें कैप्टन पर परफॉर्मेंस का कोई दवाब नही रहता था। खिलाड़ी मैदान पर जी जान लगाते और कैप्टन बाहर से चिल्ला चिल्ला कर खिलाड़ियों का हौंसला बढ़ाया करता। कप्तान के दोनो हाथो में लड्डू ही लड्डू हुआ करते थे। जीते तो कैप्टन की जीत और हारे तो खिलाडियों की हार। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली मंत्रीमंडल में अपने लिए एक ऐसी ही नॉन प्लेइंग मुख्यमंत्री की भूमिका चुनी है। महत्वपूर्ण तो छोड़िए एक भी विभाग उन्होंने कामकाज के लिए अपने पास नही रखा। नॉन प्लेइंग कैप्टन की तरह वे केवल एडमिनिस्ट्रेटिव भूमिका में होगें।

दिल्ली में मुख्यमंत्री समेत कुल सात मंत्री है। 32 मंत्रालय 6 मंत्रियों में बांटे गए हैं। अकेले मनीष सिसौदिया के पास 10 मंत्रालय हैं। इसके अलावा जो भी मंत्रालय बांटे नही जा सके, उनका काम भी मनीष सिसौदिया ही देखेंगे। केजरीवाल ने अपने को सिर्फ दूसरे मंत्रियों के कामकाज की निगरानी के लिए रख छोड़ा है। 5 साल केजरीवाल ये चुनाव अरविंद केजरीवाल के नाम पर लड़ा गया था। जीतने पर अरविंद ही मुख्यमंत्री बनेगें ये सबको पता था। पर अरविंद सिर्फ दिखावटी मुख्यमंत्री होगें ये कोई नही जानता था। जो लोग सरकारी कामकाज की बारीकियां समझते है वे बता सकते है कि दिल्ली का वास्तविक मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब नही मनीष सिसौदिया साहब हैं। "लीड बॉय एक्ज़ाम्पल" के बजाए उन्होंने "नॉन प्लेइंग मु्ख्यमंत्री" का खिताब क्यों चुना, ये तो वे ही बेहतर जानते होगें। पर आम आदमी पार्टी का चुनावी नारा "5 साल मनीष सिसौदिया" तो कतई नही था।

इसका ये मतलब नही है कि दिल्ली सरकार चलाने की काबलियत मनीष या बाकी मंत्रियो में नही है। भविष्य अपनी टिप्पणी इस पर जरूर करेगा। उन्हें परखे जाने की जरूरत है। ये भी उतना ही सच है कि आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय महत्वकांक्षा है। पर उसके लिए केजरीवाल का दिल्ली के कामकाज से हाथ खींच लेना समझ से परे है। दूसरा केजरीवाल की छवि एक अराजक राजनेता की छवि रही है। विरोधी ये लेबल उन पर चस्पा करते ही रहते थे। यदा कदा वो स्वंय भी इस पर मोहर लगाते रहे हैं। दिल्ली की सरकार एक मौके की तरह आई थी, जब वे अपने को एक बेहतर प्रशासक के रूप में साबित कर सकते थे। पर लगता है महत्वकात्क्षीं अरविंद कुछ ज्यादा ही जल्दी में हैं। पिछली बार दिल्ली सरकार से इस्तीफा दे वे अपनी जल्दबाजी का परिणाम भुगत चुके हैं। लगता है पिछली गल्तियों से कुछ खास नही सीखा अरविंद केजरीवाल ने। 

अरविंद की उम्र भी अभी कम है। वे आसानी से अपने को दिल्ली के दिल में स्थापित कर देश विजय के लिए निकल सकते थे। पर दिल्ली की कप्तानी के लिए जिस अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने चुना था उसने मैच शुरू होने से पहले ही अपने आप को अलग कर लिया। जिस देश में प्रधानमंत्री भी नॉन प्लेइंग कैप्टन होने की लिबर्टी नही ले सकता वहां अरविंद दिल्ली को नॉन प्लेइंग मुख्यमंत्री के रूप में चलाएगें। महत्वकाक्षां का ये खेल थोड़ा खलता है। उम्मीद है आप उम्मीदों पर खरें उतरेगें।


Wednesday, February 11, 2015

सुपर-हीरो की तलाश भटकता कांग्रेसी वोटर


जीत का जश्न और हार की निराशा थोड़ी कम हुई हो तो एक प्रश्न है। क्या आम आदमी पार्टी इतनी सीटें डिजर्व करती थी जितनी उन्होंने स्वंय भी कल्पना नही की थी और क्या भारतीय जनता पार्टी इतनी पिटाई डिजर्व करती थी जितनी उसकी दुर्गति हुई। देश के इतिहास में कभी इस प्रकार के नतीज़े नही आये। इंदिरा के मौत के बाद राजीव गांधी भी इतनी सीटें नही जीत पाए थे। जितनी आम आदमी पार्टी की झोली में गिरी। विशालतम राजनीतिक लहर भी कभी किसी को इतनी सीटें नही दिला पाई। इन असाधारण परिणामों की वजह भी असाधारण ही होनी चाहिए।


महज़ 6 साल पुरानी बात है, लोकसभा चुनावों में दिल्ली ने कांग्रेस की झोली 57 प्रतिशत वोटों से भर दी थी। यहां यह जानना भी जरूरी है कि ये आम आदमी पार्टी को हालिया मिलें 54.3 प्रतिशत से ये कहीं ज्यादा थे। पहले विधानसभा चुनाव यानी 1993 के बाद से विभन्न चुनावो में यह 6ठा ऐसा मौका था जब दिल्ली ने एक ही पार्टी को 50 प्रतिशत से ज्यादा मत दिये। तो दिल्ली पहले भी एकतरफा वोट करती रही है। तो इस बार ऐसा क्या अलग हुआ कि दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा दो अंको में भी नही पहुंच सके।

दरअसल इसकी सबसे बड़ी वजह रही कांग्रेस का बुरी तरह पिटना। चुनाव दर चुनाव कांग्रेस ने अपना जनाधार खो रही है। देश की सबसे बड़ी पार्टी के जनाधार खोने की गति भी आश्चार्यजनक रूप से तेज है। दिल्ली में कांग्रेस लगभग 57 प्रतिशत वोट से 10 प्रतिशत पर पहुंच गई। यानि 6 सालों के भीतर कांग्रेस का 82 फीसदी वोट छिटक गया।  

कांग्रेस का दिल्ली में गिरता वोट शेयर 
2009 ----57 प्रतिशत
2012 ...... 31 प्रतिशत
2013 ...... 25 प्रतिशत
2014 ...... 15 प्रतिशत
2015 ...... 9.7 प्रतिशत

राजनीतिक वातावरण में कांग्रेस ने एक ऐसा वैक्यूम बना दिया। जिसे भरने को बहुत सी पार्टियां दावेदार हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह काम भारतीय जनता पार्टी ने किया। सौ प्रतिशत तो नही पर बहुत बड़ा वर्ग भाजपा की तरफ आकर्षित हुआ। कुछ राज्य स्तरीय दलों को भी इसका फायदा पहुंचा। भाजपा अपने प्रपंचों में ही उलझी रही और दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस जनित वैक्यूम को भरने में सफल रही। कांग्रेस से अलग हुआ वोटर अभी अपनी राजनीतिक दिशा तय नही कर पाया है। कांग्रेस में उसे भविष्य दिखाई नही देता इसलिए अपना वोट बेकार करने के बजाए वो कई तरह के प्रयोग कर रहा है। 2014 में मोदी के उभार के साथ वो मोदी को वोट देता है और 2015 में उसे केजरीवाल में नायक दिखाई देता है। यहां एक बात दीगर है कि ये कांग्रेसी वोटर अधिनायकवाद की राजनीति से निकल कर आया है। इसे आज भी वोट करने के लिए एक सुपर-हीरो की जरूरत है। जो उसे राष्ट्रीय स्तर पर मोदी में और दिल्ली के स्तर पर केजरीवाल में दिखाई देता है।  

भाजपा के कुछ लोग दावा कर रहे है कि पिछली विधानसभा के मुकाबले भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत कंसोलिडेट किया है। पर जनाब जब टेबल पर कांग्रेस के लगभग 82 फीसदी वोट बटोरनें को पड़े हो तो अपने वोटों पर फोकस करना राजनीतिक आत्महत्या सरीखा ही हैं। भाजपा के पास इन वोटरों को लुभाने का कोई प्लान नही था। दिल्ली भाजपा के स्थापित चेहरों को परे हटा कर किरण बेदी को ले आया गया। इससे दो नुकसान हुए पहला भाजपा संगठनात्मक रूप से कमजोर हुई और दूसरा जिस सुपर हीरो की तलाश में वोटर था वो उसे किरण बेदी के रूप में नजर नही आया। किरण उसे केजरीवाल की सबोर्डिनेट सरीखी ही ज्यादा लगी। और जब दोनो एक ही आंदोलन से निकले हो और केजरीवाल का रूतबा ज्यादा हो तो फिर केजरीवाल क्यों नही। भाजपा लगातार राजनीतिक भूलें करती रही और अरविंद केजरीवाल लगातार अपनी 49 दिनों की सरकार को झाड़ पौंछ कर लोगों के सामने रखते रहे।

भाजपा की हार के और भी बहुत से कारण गिऩाए जा सकते है मसलन अंहकारी इमेज़, संघ का चुनाव प्रचार में ठीक से ना जुटना, भाजपा दिल्ली अध्यक्ष सतीश उपध्याय को आखिरी वक्त में किनारे लगा देना, जिससे भाजपा की सारी जमीनी व्यवस्था बिगाड़ गईं। हर्षवर्धन को सही तरीके से इस्तेमाल ना करना, दिल्ली की पॉलटिक्स को गुजराती स्टाइल में चलाना वगैरह वगैरह। इनका भी अपना सीमित महत्व है पर जो पॉलटिकल पार्टी नए राजनीतिक वातावरण में कांग्रेस से अलग हुए वोटर को साध लेगी वही पार्टी राज करेगी फिर चाहे वो मोदी हो या केजरीवाल।