Tuesday, August 12, 2014

संघ परिवार का मोदी विरोध


कुछ लोग बोल रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली, कुछ लोग बोल रहें हैं कि कोई व्यक्ति के कारण जीत मिली। कोई व्यक्ति, पार्टी या संगठन की वजह से यह परिवर्तन नही हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन चाहा। ये लोग और पार्टी तो पहले भी मौजूद थे, तब सत्ता क्यों नही मिली? लोगो ने परिवर्तन चाहा तब पार्टी को सत्ता मिली" - मोहन भागवत


पहली नजर में संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस वक्तव्य में कुछ भी गलत नही लगता। सरसंघचालक ने ये बात 10 अगस्त को उड़ीसा में संस्कृत सुरक्षा समिति के एक कार्यक्रम के दौरान कही। इसके ठीक दो दिन पहले यानि 8 अगस्त को दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीत का सेहरा अमित मोदी के सिर बांध चुके थे। मोदी ने अमित शाह को 2014 लोकसभा चुनावों का मैन ऑफ द मैच क्या कहा, भाजपा के 11 अशोक रोड स्थित केंद्रीय कार्यालय में उसकी जोरदार गूंज सुनाई देने लगी। तभी मोहन भागवत का ये बयान आया। कोई कुछ भी कहे पर वक्तव्य की टाइमिंग अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
 
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भागवत अकेले नही हैं, संघ परिवार के कई और संगठन भी अब मोदी और मोदी सरकार के विरोध में कूद पड़े हैं। CSAT पर संघ के विद्यार्थी संगठन, विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली और देशभर में जोरदार प्रदर्शन किये। छात्रों को काबू पाने के लिए पुलिस को कई जगह काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। रक्षा और इंशोयरंस क्षेत्र में FDI की सीमा बढ़ाने का भारतीय मजदूर संघ खुला विरोध कर रहा है। स्वदेशी जागरण मंच मौजूदा सरकार के केंद्रीय बजट को फेल घोषित कर चुका है। मोदी सरकार द्वारा, जी एम बीज़ों के खुले परीक्षण की अनुमति दिये जाने को भी उसने सिरे से नकार दिया है। एक कदम आगे बढ़ कर स्वदेशी जागरण मंच ने मोदी सरकार को ही एक धोखा बता दिया।भारत के लोग, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को चुना, वे स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। स्वेदेशी जागरण मंच द्वारा जारी प्रैस विज्ञप्ति की इस एक लाईन से ही आप विरोध की तीव्रता को सूंघ सकते हैं। उधर प्रवीण तोगड़िया और मोदी की अनबन तो जगजाहिर है। पर शुद्ध हिंदुवादी संगठन विश्व हिंदु परिषद की पत्रिका हिंदु विश्व के ताज़ा अंक में सम्पादक मान्वेद्र नाथ पंकज ने नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए लिखा हैं कि पाकिस्तान से बार बार दोस्ती की पींगें बढ़ाने की हूंक नरेंद्र मोदी जैसे नेता के मन से भी नही जा रही तो क्या ये हमारे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण नही है।सम्पादकीय में मुस्लिम तुष्टिकरण के विषय पर मोदी सरकार की दो अहम मंत्रियों नज़मा हेपतुल्ला और सुषमा स्वराज को भी निशाने पर लिया गया है।

संघ परिवार का विरोध झेल रही बीजेपी भी उसी परिवार का एक हिस्सा है। तो फिर क्या ये माना जाना चाहिए कि परिवार में फूट पड़ गई है। संघ समर्थक विचारक ऐसा नही मानते। वे ऐसे कई उदाहराण गिनाते है जब परिवार के अन्य संगठन एक दूसरे के सामने आ खड़े हुए। ताजा मामला 25 जुलाई का है, भारतीय मजदूर संघ ने राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ जयपुर में रैली निकाली थी। तर्क यह है कि संघ परिवार के संगठन अलग अलग क्षेत्रों में काम करते है। उनका ना केवल कार्य क्षेत्र अलग है उनके मुद्दो में भी कोई समानता नही हैं। बल्कि कई बार तो किसी खास मुद्दे पर टकराहट जैसी स्थिति बन जाती है। पर इस का मतलब यह नही कि परिवार में फूट पड़ गई। संगठनों के आपसी विरोध को संघ समर्थक आदर्शवादी चश्में से देखते है। उनका मानना है कि सभी संगठन हिंदुवादी विचार से जुड़े है और कभी कभार उभरने वाले विरोधों को आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाता है।

दूसरी और इन विरोधों को नूरा कुश्ती मानने वालों की कोई कमी नही। जब मामला मिल बांट कर सुलझा ही लिया जाना है, तो विरोध का नाटक क्यों। संघ विरोधी इन औपचारिक विरोधों की तीव्रता पर भी सवालिया निशान लगाते हैं। पिछली राजग सरकार के समय FDI के मुद्दे पर भारतीय मजदूर संघ ने स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी की लीडरशिप में जबरदस्त देशव्यापी आंदोलन चलाया था। रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली भी हुई। पर मोदी सरकार के खिलाफ भारतीय मजदूर संघ बस गाल बजाता रहा और मोदी ने FDI सम्बंधित तमाम फैसले ले लिए।

सरकारें निरंकुश ना हो जायें इस लिए सदन में विपक्ष की और समाज में अलग अलग तरह के संगठनों की सख्त जरूरत होती है। इन्हीं सब की बदौलत देश में समाजिक, आर्थिक और राजनितिक संतुलन कायम रहता हैं। देश में मोदी सरकार को संयमित रखने के लिए क्या सचमुच पर्याप्त विपक्ष मौजूद है? हालत यह है कि दिशाहीन कांग्रेस में दमदार विपक्ष का कोई लक्ष्ण दिखाई नही देता। यहां तक कि लोकसभा में विपक्ष का नेता पद भी अब उसके पास नही है, क्योंकि वो जरूरी 55 सीटे भी नही जीत पाई। स्वस्थ परम्परा के नाम पर मोदी कांग्रेस पर दया दिखाने को बिलकुल तैयार नही हैं। कांग्रेस की दावेदारी नकारते हुए, लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद भी अब जयललिलता की AIADMK  पार्टी के एम थम्बीदुरई को दिया जा सकता है। मतलब साफ है मोदी विपक्ष की ताकत को कम से कम कर देना चाहते है। दूसरी तरफ बीजेपी पहले ही मोदी के सामने घुटने टेक चुकी है। अपने करीबी अमित शाह को बीजेपी अध्यक्ष पद पर बैठा कर मोदी सरकार के साथ साथ बीजेपी के भी एकछत्र नेता बन चुके हैं। अब सरकार के भीतर की बात कर लें। कैबिनेट के बंद दरवाजों से जो खबरें छन कर बाहर आ रही हैं। उनके मुताबिक सारे अहम फैसले मोदी ही लेते हैं। कैबिनेट के सामुहिक फैसले लेने और स्वतंत्रत तरीके से काम करने की काबलियत शक के दायरे में हैं।
    
राजनीतिक विरोध शून्यता के बीच न्याय व्यवस्था भी अपनी चमक खो रही है। ज्यूडिशरी सिस्टम अपने पूर्व मुख्य न्यायधीश काटजू के सवालों और आरोपों में ही उलझा है। उधर सरकार ने 11 अगस्त को नेशनल ज्यूडिशियल एपॉइंटमेट बिल पेश कर दिया। बिल पास हुआ तो कमीशन जजो की नियुक्ति करेगा। इसके अच्छे बुरे प्रभाव अभी सामने आने बाकी हैं पर पुरानी व्यवस्था खत्म हो जायेगी। यकीनन तब तक ज्यूडिशरी में उहापोह की हालत बनी रहेगी। देश में NGO की छवि पहले ही बहुत अच्छी नही थी। कुछ NGO  के खिलाफ अभियान क्या चला, सभी NGO लोगों को चोर नजर आने लगे। उनकी विशवसनीयता को भारी धक्का पहुंचा है। अन्ना का समाजिक आन्दोलन भी रामलीला मैदान से जंतर मंतर पहुंचते पहुंचते राजनीतिक पार्टी में बदल गया। केजरीवाल भी राजनीति में अनाड़ी साबित हुए। अन्ना आन्दोलन के बाद निकट भविष्य में कोई स्वयं स्फूर्त समाजिक आंदोलन के खड़े होने की उम्मीद भी अब कम ही बची है। यानि विरोध के स्वर जहां जहां से आ सकते थे, वे सब अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।  

जो ऐतिहासिक विरोध शून्यता देश में बनी है वो यकीनन मोदी की वजह से नही है। ना टाले जाने वाली परिस्थितियों की वजह से देश में बस मोदी ही मोदी नजर आने लगें हैं। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा की मोदी में निरंकुश होने के लक्षण नजर आने लगे हैं। पर फिसलन भरी जगह पर सम्भल कर चलने की बजाये फिसलन की वजहों को खत्म करना ज्यादा कारगर रहता है। इस खास वक्त में संघ राजनैतिक सतुलंन कायम करने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है। मोहन भागवत को विरोध की एक ऐसी लकीर खींचनी होगी जिससे रचानात्मक विरोध तो हो और संघ परिवार भी बना रहे। ऐसी हालत में जब संसद में और पार्टी में मोदी को दूर दूर तक कोई खतरा ना हो तब संघ परिवार के भीतर से विरोध के स्वर उभरना सत्ता सतुंलन कायम कर सकता हैं। इस विरोध का स्वागत होना चाहिए, फिर चाहे ये विरोध औपचारिक ही क्यों ना हो।




Friday, August 8, 2014

गांधी खानदान के हाथों फिसलती कांग्रेस


राहुल गांधी संसद के वेल में पहुंचे नहीं कि खबर बन गई। कांग्रेसी सांसदों के साथ मिल कर राहुल ने खूब नारेबाजी की। दस साल तक लोकसभा में सत्ता की बेंचों पर सुख की बंसी बजाते हुए राहुल ने बहुत कम ही संसद की बहसों में हिस्सा लिया
था। फिर ऐसा क्या हो गया कि राहुल को अपने खोल से बाहर निकल कर शोरगुल और नारेबाजी का सहारा लेना पड़ा। दरअसल लोकसभा में करारी हार के बाद कांग्रेस की हालत पस्त है। गांधी परिवार पर अंदर और बाहर हर तरफ से हमले हो रहे हैं। नैशनल हेराल्ड की सम्पत्ति के अवैध इस्तेमाल का मामला कोर्ट में है। उधर सोनिया प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनी, इस बात का खुलासा कर गांधी खानदान के पुराने वफादार नटवर सिंह ने सोनिया के आभामंडल को नौंच खसौंट कर रख दिया है। प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद बनी त्याग की मूर्ति वाली छवि को नटवर ने तहस नहस कर दिया। नैतिकता की जो डोर सोनिया ने मजबूती से थाम रखी थी, उस को काटने की पूरी कोशिश नटवर ने अपनी किताब में की है। हलांकि सोनिया ने अपनी तरफ से भी किताब लिखने की घोषणा कर आग में पानी डालने की कोशिश जरूर की है, पर जो नुकसान होना था हो चुका।

उधर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह की किताब भी मार्केट में आने की संभावना है। किताब मूलरूप से मनमोहन की ईमानदारी और कांग्रेसी नेताओं द्वारा उनकी राह में बिछाये गए कांटो के बारे में होगी। ईशारों में ही सही निशाने पर गांधी खानदान ही होगा। कभी कांग्रेस में बिना गांधी परिवार की मर्जी के एक पत्ता भी नही हिलता था, पर हालात अब बदल रहे हैं। अब तो हर छोटा-बड़ा नेता गांधी परिवार पर निशाना साध रहा है। पंजाब के नेता और कांग्रेस कार्यसमिती के पूर्व सदस्य जगमीत बराड़ ने तो सोनिया और राहुल को दो साल के लिए छुट्टी पर चले जाने की नसीहत दे डाली। आग अभी बुझी भी नही थी कि उन्होंने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की हालत लावारिस कुत्ते के बराबर बता दी।


राज्यों में भी कांग्रेसियों की हालात बिना जनरल के अधमरी सेना जैसी होती जा रही है। हरियाणा में कांग्रेस के बड़े नेता बीरेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। असम के स्वस्थय मंत्री हेमंत विश्व सरमा ने मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। महाराष्ट्र में आला नेताओं की खींचतान के बीच कोकंण के कद्दावर नेता नारायण राणे पार्टी से इस्तीफा दे कर दोबारा पार्टी में अनमने मन से लौट चुके है। सहयोगी दलो के साथ भी रिश्तों में अब वो गर्मजोशी दिखाई नही देती। एनसीपी की लगातार धमकियों के बावजूद महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन बचाने के लिए कांग्रेस को झुकना पड़ा। एनसीपी ने पिछले चुनावों के मुकाबले आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने कोटे से दस सीटें ज्यादा हड़प ली। नेशनल कॉफ्रेंस ने भी आगामी जम्मू कश्मीर चुनावो में कांग्रेस से पल्ला झाड़ लिया है।

कल तक गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना कोई कांग्रेसी कर ही नही कर सकता था। पर आज ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस के भीतर से ही विऱोध के स्वर उठने लगे। विरोध कई स्तर पर है मुखर भी, बौध्दिक भी और कहीं गहरे भी। मुखर विरोध तो कई तरफ से हो रहा है, पर कुछ दूसरे तरह के विरोधों पर भी नजर डालें। कांग्रेस ने जब संसद में इंश्योरेंस बिल को लटकायें रखा। तब वरिष्ठ नेता और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिहं ने इंश्योरेंस बिल पर कांग्रेस को राजनिति से बचने की सलाह दी। उनका मानना है कि इससे कांग्रेस की छवि खराब होगी।

गांधी परिवार के फैसलों और क्रियाकलापों पर अपनी राय जाहिर करने की ये हिम्मत कांग्रेसियों में आई कहां से? कांग्रेस के बड़े लीडरों में शुमार कोई भी नाम आप याद कीजिए, किसी ने कभी भी गांधी खानदान के खिलाफ आवाज नही उठाई। और अगर उठाई तो कांग्रेस के अन्य नेताओं ने झुंड बना कर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। गांधी परिवार निर्विवाद कांग्रेस का नेतृत्व करता रहा। जमीनी नेताओं की भीड़ के बीच भी कांग्रेस में वोट इकट्ठा करने की कूव्वत गांधी परिवार के पास ही मानी जाती रही। कांग्रेस में इस बात को लगभग हर कोई मानता था कि सत्ता अगर कोई दिला सकता है तो वो गांधी खानदान ही हैं।

दरअसल कांग्रेस चलती ही अधिनायकवाद पर है। इतिहास गवाह है कि जवाहर लाल नेहरू से ले कर सोनिया-राहुल तक का अपना एक करिश्मा रहा है। पर अब ये करिश्मा टूट रहा हैं। इससे कांग्रेस में  भारी कोहराम मचा है। एकतरफ नटवर सिंह ने सोनिया गांधी के आभामंडल को निशाने पर लिया हैं। दूसरी तरफ राहुल की लगातार चुनावी नाकामी से कांग्रेसियों में भारी बेचैनी हैं। याद किजीए 2008 में जब कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते, राहुल को पी एम पद का मैटिरियल बताया था। तब कैसे सभी कांग्रेसी नेताओं की बाछें खिल गई थी। पर 2004 से राजनीति में कदम रखने वाले राहुल पिछले दस सालों में कुछ खास कमाल नही कर सके। राहुल की लीडरशिप पर सवालिया निशान तो 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में ही लगने शुरू हो गए थे । राहुल इन चुनावों में मुख्य भूमिका में थे पर 403 में से कांग्रेस कुल 22 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। अगला विधानसभा चुनाव 2012 में सीधे साधे राहुल की लीडरशिप में लड़ा गया। राहुल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। पूरे उत्तर प्रदेश में 200 से ज्यादा रैलियां की एंग्री-यंग-मैन की छवि बनाने के लिए बाहों की आस्तीन ऊपर चढ़ाई, कागज फाड़ कर हवा में उछाले पर कुछ काम ना आया। पिछली बार से सिर्फ 6 सीटें ही ज्यादा मिल पाई यानि कुल 28, यहां तक की उनकी अपनी परम्परागत सीट अमेठी की 15 विधानसभा सीटों में से कुल 2 पर ही जीत मिल सकी। हलांकि 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यूपी में 21 सीटें जीत कर ठीक ठाक प्रर्दशन किया, पर कांग्रेसियों के मन में राहुल को लेकर संदेह पैदा हो गया।

2013 में राहुल को कांग्रेस का उपाध्क्ष बना कर औपचारिक रूप से उनका राज्याभिषेक कर दिया गया। कांग्रेस जीतती तो 2014 में प्रधानमंत्री राहुल ही होते। 2014 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेसियों के इस डर को यकीन में बदल दिया कि अगर राहुल नेता रहे तो कांग्रेस का नसीब सत्ता से रूठा रहेगा। हताशा का आलम ये था कि लोकसभा चुनावों में हार के तुरंत बाद, मिलिंद देवड़ा जैसे युवा नेता जो कभी समान्य काम काज के लिए भी राहुल के इशारों का इंतजार करते थे। राहुल की इर्द गिर्द के नेताओं पर निशाना साधने लगें।  

यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस के अधिनायकवाद से चिपके रहने की सबसे बड़ी वजह सत्ता प्राप्ति ही थी। सोनिया अपने राजनीतिक कैरियर के अंतिम पड़ाव पर है और राहुल के रूप में जो नया नायक बचा है, उससे कांग्रेसीयों को बहुत कम उम्मीद हैं। कांग्रेसियों की पूरी आशाऐँ अब बस प्रियंका गांधी पर ही टिकीं है। कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने ये कह कर इस पर मोहर लगा दी है कि कार्यकर्त्ता तीनों गांधियों को राजनीति में देखना चाहते है। बाकि दोनो गांधी-सोनिया और राहुल तो पहले से ही सक्रिय राजनीति में हैं। तो फिर यह कहने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी। कांग्रेस के अंदर उठा प्रियंका प्रियंका का शोर अब एक शक्ल लेने लगा है। ये आम सहमति बनती जा रही है कि प्रियंका को आगे लाया जाना चाहिए और उन्हें बड़ी जिम्म्दारी दी जानी चाहिए। पर सोनिया शायद इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नही है। पूरी कांग्रेस से इतर वो अभी भी राहुल पर दांव लगाना चाहती हैं। राहुल कांग्रेस के सर्वमान्य नेता बने इसके लिए सोनिया पूरा जोर लगा रही है। 10 सालों से संसद में ना के बराबर बोलने वाले राहुल अचानक संसद की वेल में कूद कर नारे क्यों लगाने लगते है। इस बात का अर्थ समझना मुश्किल नही हैं। 

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने बहुत बुरा वक्त झेला है। कई बार चुनाव हारा, कई बार पार्टी का विभाजन हुआ। कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़ कर गए। इंदिरा-राजीव जैसे पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की हत्या हुई। इमरजेंसी के बाद जनता की घृणा झेली, हर बार पार्टी ने इन झंझावातों का सामना किया और पहले से मजबूत हो कर उभरी। कांग्रेस जैसी पार्टी का यूं डूबना देश हित में नही हैं। राहुल हो, प्रिंयका हो या फिर कोई ओर, पार्टी को एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पार्टी की लीडरशिप कांग्रेस के खोये गौरव को फिर से हासिल करने की पहल करेगी। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय फलक पर उभरने के बाद नयी राजनीति का जो दौर भारत में आया है उस में एक मजबूत राजनितिक प्लान ही कांग्रेस की नैया पार लगा सकता है। केवल संसद में नारेबाजी और शोरशराबे से इसे हासिल नही किया जा सकता। 

Friday, August 1, 2014

हाई कमान संस्कृति में जकड़ी आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी ने महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, झारखंड और हरियाणा में चुनाव ना लड़ने का फैसला किया है। वह सिर्फ दिल्ली में ही पूरे दम से चुनाव मैदान में उतरेगी साथ ही पंजाब के उपचुनाव में भी हिस्सा लेगी। चुनाव से बाहर रहने का फैसला लेना या ना लेना किसी भी पार्टी का अंदरूनी मामला होता है। पर पार्टी के फैसला लेने के तरीके ने आम आदमी पार्टी को भी उसी हाई कमांड संस्कृति वाली पार्टीयों की कतार में खड़ा कर दिया है। जिसका आम आदमी पार्टी पुरजोर विरोध करती रही है।

अरविंद केजरीवाल ने कई बार इस बात की दुहाई दी है कि उनकी पार्टी हाई कमांड संस्कृति में विश्वास नही रखती। यहां तक कि पार्टी की वेब साइट के उस हिस्से में, जहां आम आदमी पार्टी को दूसरी पार्टीयों से अलग बताया गया है सबसे पहले यही बात लिखी है। बकौल वेब साइट AAP में कोई भी केंद्रीय आला कमान नही हैं। पर ये दावा कुछ बेदम सा लगता है क्योंकि AAP में भी आला कमान होने के सकेंत साफ नजर आने लगें है।

पहला सकेंत तो AAP की 49 दिन की दिल्ली में सरकार के वक्त ही मिल गया था। अचानक इस्तीफे की घोषणा कर अरविंद केजरीवाल ने सबको अवाक कर दिया। याद करियें दिसंबर-2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव बस हुए ही थे। किसी भी पार्टी से ना समर्थन लेगें ना समर्थन देगेंये नारा लगाने के चंद दिनों के अंदर ही अरविंद केजरीवाल ने कैसे दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जनमत संग्रह शुरू कर दिया। कॉसेप्ट नया था जनता उत्सुक थी। अपने ही कार्यकर्ताओं और वोटरों से बात कर आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को तैयार हो गई। 49 दिन सरकार चली भी, पर इस बार इस्तीफा देने से पहले अरविंद एंड पार्टी ने किसी से राय पूछने की जहमत तक नही उठाई। खैर बाद में गलती की माफी भी मांग ली गई पर देर हो चुकी थी।  

दूसरा संकेत मिला 2014 के लोकसभा चुनावों में, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे कद्दावर नेता लोकसभा की बस उतनी ही सीटें लड़ना चाहते थे, जितनी आम आदमी पार्टी की हैसियत थी। मतलब जहां जहां संगठन मजबूत था सिर्फ वहां वहां। पर अरविंद इससे सहमत नही थे। और क्योंकि AAP में आला कमान सिर्फ अरविंद ही है, इसलिए चली भी उन्हीं की। प्रधानमंत्री की कुर्सी बस चंद कदम ही दूर लग रही थी और देश की 432 लोकसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी चुनावों में कूद पड़ी। तर्क ये था कि हम देश में चुनाव लड़ने नही आये हम तो सेवा करने आये है। ये चुनाव तो जनता का है अगर जीतेगी तो जनता और हारेगी तो भी जनता। AAP का क्या हाल हुआ ये हम सब जानते है। 96% उम्मीदवार जमानत भी ना बचा सके। पार्टी के ज्यादातर वरिष्ठ नेता भी चुनाव हार गए।

अब हरियाणा सहित चार राज्यों में चुनाव ना लड़ने के फैसले ने पार्टी के भीतर हाई कमांड की मौजूदगी पर मुहर लगा दी है। कभी जनमत संग्रह कर अपने फैसले करने वाली पार्टी ने हरियाणा के 95% कार्यकर्ताओं की भावनाओं को दरकिनार कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। कहा ये जा रहा है कि हरियाणा प्रदेश की AAP राज्य कमेटी ने ही चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। और उन्ही की तरफ से आये चुनाव ना लड़ने के प्रस्ताव पर ये फैसला लिया गया।

AAP हरियाणा की तरफ से आये प्रस्ताव पर गौर फरमाइये। इसमें साफ कहा गया है कि 95% वॉलेंयिटर चुनाव लड़ने के पक्ष में थे। चुनाव लड़ा जाये कि नही इस पर बकायदा वॉलेंयिटरस की राय ली गई थी। जिसमें केंद्रीय ऑब्जर्वर भी शामिल हुए। इस राय को 10 जुलाई को हुई AAP की PAC यानि पॉलिटिकल अफेयर कमेटी में पेश किया गया। हफ्ते भर मसला आला कमान, PAC, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राज्य कमेटी के बीच झूलता रहा। 18 जुलाई को फिर से हुई PAC की बैठक में ये कहा गया कि खासतौर पर राष्ट्रीय संयोजक (अरविंद केजरीवाल) की सहमति के बिना हरियाणा में चुनाव लड़ना व्यवहारिक नही होगा। इस शब्द खासतौर पर खास ध्यान देने की जरूरत है। अरविंद की राय 95% वॉलेंयिटरस की उम्मीदों पर भारी पड़ी।

प्रस्ताव के आखिरी में लिखी चंद लाईने AAP में हाई कमान संस्कृति को पूरी तरह से नंगा कर देती है। इन्हें जस का तस प्रस्ताव से लिया गया है। ऐसे में आम आदमी पार्टी, हरियाणा की राज्य कार्यकारिणी की भारी मन से यह राय है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की पूरी सहमति के बिना चुनाव लड़ने का कोई औचित्य नही रह जाता यहां राष्ट्रीय नेतृत्व का मतलब अरविंद केजरीवाल से है यह बताने की कोई जरूरत नही।

यहां महत्वपूर्ण यह है कि क्यों, आम आदमी पार्टी ने अपनी लीक से हट कर चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया। AAP नेता इसे पुरानी गलतियों से लिया गया सबक बता रहे है। पर बात कहीं ज्यादा गहरी है, दरअसल पूरी आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के इर्द गिर्द घूमती है। इसमें कुछ बुराई भी नही पर पार्टी जब शीर्ष नेतृत्व की स्वार्थ साधना का औजर बनने लगती है तो उसके दुषपरिणाम नजर आने लगते हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाहत में पहले भी अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का इस्तेमाल कर चुके है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की पूरी ताकत केजरीवाल के चुनाव क्षेत्र बनारस में काम कर रही थी। इस बात पर कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी जैसे दिग्गज AAP नेता खुले तौर पर नाराजगी जाहिर कर चुके है।

अरविंद केजरीवाल की नजर अब दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। तो वे पार्टी की पूरी ताकत केवल दिल्ली में झोंक देना चाहते हैं। देश भर के कार्यकर्ताओं को दिल्ली चुनावों पर फोकस करने को कहा गया है। और जाहिर है अगर चार दूसरे राज्यों में भी पार्टी चुनावों में हिस्सा लेगी तो ध्यान बंट जायेगा। ये जरूरी नही कि पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ें, कम सीटों पर भी चुनाव लड़ा जा सकता था। पर पार्टी एक खास राज्य में चुनाव जीतने के लिए बाकि राज्यों में चुनावों का बॉयकाट कर रही है। 

देश में गैर परम्परागत राजनीती का आगाज किया था आम आदमी पार्टी ने। भष्टाचार के खात्में की लड़ाई में बहुत से युवा वैचारिक रूप से उसके साथ जुड़े भी। नये तरह से पार्टी को चलाने की कवायद को लोगों ने खूब सराहा। पर आज आम आदमी पार्टी अपनी ही हाई कमांड कार्यशैली में उलझी दिखाई देती है। अगर पार्टी को देश में अपना स्थान बनाना है तो उसे अपने विचार पर अडिग रहना होगा, अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। फैसलों को लिए जाने वाले तरीकों को पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाना होगा। हाई कमांड संस्कृति को खत्म कर कार्यकर्ताओं की बात गौर से सुननी होगी। और इन सबसे ऊपर पार्टी को अंदरूनी लोकतंत्र बहाल करना होगा नही तो आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल पार्टी