“कुछ लोग बोल
रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली, कुछ लोग बोल रहें हैं कि कोई व्यक्ति के कारण जीत मिली। कोई
व्यक्ति, पार्टी या संगठन की वजह से यह परिवर्तन नही हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन
चाहा। ये लोग और पार्टी तो पहले भी मौजूद थे, तब सत्ता क्यों नही मिली? लोगो ने परिवर्तन चाहा तब पार्टी को
सत्ता मिली" - मोहन भागवत
पहली नजर में संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस
वक्तव्य में कुछ भी गलत नही लगता। सरसंघचालक ने ये बात 10 अगस्त को उड़ीसा में ‘संस्कृत सुरक्षा समिति’ के एक कार्यक्रम के दौरान कही। इसके ठीक
दो दिन पहले यानि 8 अगस्त को दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक
में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीत का सेहरा अमित मोदी के सिर बांध चुके थे। मोदी
ने अमित शाह को 2014 लोकसभा चुनावों का ‘मैन ऑफ द मैच’ क्या कहा,
भाजपा के 11 अशोक रोड स्थित केंद्रीय कार्यालय में उसकी जोरदार गूंज सुनाई देने
लगी। तभी मोहन भागवत का ये बयान आया। कोई कुछ भी कहे पर वक्तव्य की टाइमिंग अपने
आप में बहुत कुछ कहती है।
भागवत अकेले नही हैं, संघ परिवार के कई और
संगठन भी अब मोदी और मोदी सरकार के विरोध में कूद पड़े हैं। CSAT पर संघ के विद्यार्थी संगठन, विद्यार्थी
परिषद ने दिल्ली और देशभर में जोरदार प्रदर्शन किये। छात्रों को काबू पाने के लिए
पुलिस को कई जगह काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। रक्षा और इंशोयरंस क्षेत्र में FDI की सीमा बढ़ाने का भारतीय मजदूर संघ खुला
विरोध कर रहा है। स्वदेशी जागरण मंच मौजूदा सरकार के केंद्रीय बजट को फेल घोषित कर
चुका है। मोदी सरकार द्वारा, जी एम बीज़ों के खुले परीक्षण की अनुमति दिये जाने को
भी उसने सिरे से नकार दिया है। एक कदम आगे बढ़ कर स्वदेशी जागरण मंच ने मोदी सरकार
को ही एक धोखा बता दिया। “भारत के लोग, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को
चुना, वे स्वयं को ठगा हुआ
महसूस कर रहे हैं।“ स्वेदेशी
जागरण मंच द्वारा जारी प्रैस विज्ञप्ति की इस एक लाईन से ही आप विरोध की तीव्रता
को सूंघ सकते हैं। उधर प्रवीण तोगड़िया और मोदी की अनबन तो जगजाहिर है। पर शुद्ध
हिंदुवादी संगठन विश्व हिंदु परिषद की पत्रिका ‘हिंदु विश्व’ के ताज़ा
अंक में सम्पादक मान्वेद्र नाथ पंकज ने नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए लिखा हैं
कि “ पाकिस्तान से बार
बार दोस्ती की पींगें बढ़ाने की हूंक नरेंद्र मोदी जैसे नेता के मन से भी नही जा
रही तो क्या ये हमारे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण नही है।“ सम्पादकीय में मुस्लिम तुष्टिकरण के विषय
पर मोदी सरकार की दो अहम मंत्रियों नज़मा हेपतुल्ला और सुषमा स्वराज को भी निशाने पर
लिया गया है।
संघ परिवार का विरोध झेल रही बीजेपी भी
उसी परिवार का एक हिस्सा है। तो फिर क्या ये माना जाना चाहिए कि परिवार में फूट
पड़ गई है। संघ समर्थक विचारक ऐसा नही मानते। वे ऐसे कई उदाहराण गिनाते है जब
परिवार के अन्य संगठन एक दूसरे के सामने आ खड़े हुए। ताजा मामला 25 जुलाई का है, भारतीय
मजदूर संघ ने राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ
जयपुर में रैली निकाली थी। तर्क यह है कि संघ परिवार के संगठन अलग अलग क्षेत्रों
में काम करते है। उनका ना केवल कार्य क्षेत्र अलग है उनके मुद्दो में भी कोई
समानता नही हैं। बल्कि कई बार तो किसी खास मुद्दे पर टकराहट जैसी स्थिति बन जाती
है। पर इस का मतलब यह नही कि परिवार में फूट पड़ गई। संगठनों के आपसी विरोध को संघ
समर्थक आदर्शवादी चश्में से देखते है। उनका मानना है कि सभी संगठन हिंदुवादी विचार
से जुड़े है और कभी कभार उभरने वाले विरोधों को आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाता
है।
दूसरी और इन विरोधों को नूरा कुश्ती मानने
वालों की कोई कमी नही। जब मामला मिल बांट कर सुलझा ही लिया जाना है, तो विरोध का
नाटक क्यों। संघ विरोधी इन औपचारिक विरोधों की तीव्रता पर भी सवालिया निशान लगाते
हैं। पिछली राजग सरकार के समय FDI के मुद्दे पर भारतीय मजदूर संघ ने स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी की लीडरशिप
में जबरदस्त देशव्यापी आंदोलन चलाया था। रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली भी हुई। पर मोदी सरकार के खिलाफ भारतीय
मजदूर संघ बस गाल बजाता रहा और मोदी ने FDI सम्बंधित तमाम फैसले ले लिए।
सरकारें निरंकुश ना हो जायें इस लिए सदन
में विपक्ष की और समाज में अलग अलग तरह के संगठनों की सख्त जरूरत होती है। इन्हीं
सब की बदौलत देश में समाजिक, आर्थिक और राजनितिक संतुलन कायम रहता हैं। देश में
मोदी सरकार को संयमित रखने के लिए क्या सचमुच पर्याप्त विपक्ष मौजूद है? हालत यह है कि दिशाहीन कांग्रेस में
दमदार विपक्ष का कोई लक्ष्ण दिखाई नही देता। यहां तक कि लोकसभा में विपक्ष का नेता
पद भी अब उसके पास नही है, क्योंकि वो जरूरी 55 सीटे भी नही जीत पाई। स्वस्थ
परम्परा के नाम पर मोदी कांग्रेस पर दया दिखाने को बिलकुल तैयार नही हैं। कांग्रेस
की दावेदारी नकारते हुए, लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद भी अब जयललिलता की AIADMK पार्टी के एम थम्बीदुरई को दिया जा सकता है। मतलब
साफ है मोदी विपक्ष की ताकत को कम से कम कर देना चाहते है। दूसरी तरफ बीजेपी पहले
ही मोदी के सामने घुटने टेक चुकी है। अपने करीबी अमित शाह को बीजेपी अध्यक्ष पद पर
बैठा कर मोदी सरकार के साथ साथ बीजेपी के भी एकछत्र नेता बन चुके हैं। अब सरकार के
भीतर की बात कर लें। कैबिनेट के बंद दरवाजों से जो खबरें छन कर बाहर आ रही हैं।
उनके मुताबिक सारे अहम फैसले मोदी ही लेते हैं। कैबिनेट के सामुहिक फैसले लेने और स्वतंत्रत तरीके से काम करने की काबलियत शक के दायरे में हैं।
राजनीतिक विरोध शून्यता के बीच न्याय
व्यवस्था भी अपनी चमक खो रही है। ज्यूडिशरी सिस्टम अपने पूर्व मुख्य न्यायधीश काटजू
के सवालों और आरोपों में ही उलझा है। उधर सरकार ने 11 अगस्त को नेशनल ज्यूडिशियल
एपॉइंटमेट बिल पेश कर दिया। बिल पास हुआ तो कमीशन जजो की नियुक्ति करेगा। इसके
अच्छे बुरे प्रभाव अभी सामने आने बाकी हैं पर पुरानी व्यवस्था खत्म हो जायेगी।
यकीनन तब तक ज्यूडिशरी में उहापोह की हालत बनी रहेगी। देश में NGO की छवि पहले ही बहुत अच्छी नही थी। कुछ NGO के खिलाफ अभियान क्या चला, सभी NGO लोगों को चोर नजर आने लगे। उनकी विशवसनीयता को भारी धक्का पहुंचा है।
अन्ना का समाजिक आन्दोलन भी रामलीला मैदान से जंतर मंतर पहुंचते पहुंचते राजनीतिक
पार्टी में बदल गया। केजरीवाल भी राजनीति में अनाड़ी साबित हुए। अन्ना आन्दोलन के
बाद निकट भविष्य में कोई स्वयं स्फूर्त समाजिक आंदोलन के खड़े होने की उम्मीद भी अब
कम ही बची है। यानि विरोध के स्वर जहां जहां से आ सकते थे, वे सब अपनी समस्याओं से
जूझ रहे हैं।
जो ऐतिहासिक विरोध शून्यता देश में बनी है
वो यकीनन मोदी की वजह से नही है। ना टाले जाने वाली परिस्थितियों की वजह से देश
में बस मोदी ही मोदी नजर आने लगें हैं। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा की मोदी में निरंकुश
होने के लक्षण नजर आने लगे हैं। पर फिसलन भरी जगह पर सम्भल कर चलने की बजाये फिसलन
की वजहों को खत्म करना ज्यादा कारगर रहता है। इस खास वक्त में संघ राजनैतिक सतुलंन
कायम करने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है। मोहन भागवत को विरोध की एक ऐसी
लकीर खींचनी होगी जिससे रचानात्मक विरोध तो हो और संघ परिवार भी बना रहे। ऐसी हालत
में जब संसद में और पार्टी में मोदी को दूर दूर तक कोई खतरा ना हो तब संघ परिवार
के भीतर से विरोध के स्वर उभरना सत्ता सतुंलन कायम कर सकता हैं। इस विरोध का
स्वागत होना चाहिए, फिर चाहे ये विरोध औपचारिक ही क्यों ना हो।