Friday, November 7, 2014

मोदी मोदी नही मुखी मुखी

दिल्ली में नए चुनावों का रास्ता आखिर साफ हो ही गया और साथ ही शुरू हो गई राजनीतिक सरगर्मीयां। चुनाव होने में तो खैर अभी देर है पर पार्टियां चुनावों की तैयारी में लग गईं। इन्ही तैयारीयों के बीच दिल्ली के पिछले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहली प्रैस कॉफ्रैंस कर डाली। उस पत्रकार वार्ता में वैसे तो आम आदमी पार्टी नेताओं ने कई बाते कहीं पर दो बाते बड़ी महत्वपूर्ण थी। पहली आम आदमी पार्टी के एजेंडे से जन लोकपाल मुद्दे का गायब हो जाना। और दूसरा केजरीवाल की तुलना बीजेपी नेता जगदीश मुखी से करना।

अन्ना के कंधे पर सवार हो, जन लोकपाल का झंडा थामें, आम आदमी पार्टी ने जब राजनितिक गलियारों में कदम रखा। तब उनके एजेंडे में जन लोकपाल सबसे ऊपर हुआ करता था। यहां तक की दिल्ली सरकार भी इसी मुद्दे पर गिर गई थी। तर्क यह था कि केजरीवाल को कांग्रेस खुल कर काम नही करने दे रही, इसलिए सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नही है। केजरीवाल का वो बयान याद कीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि भष्ट्राचार के खात्मे के लिए वे तो जन लोकपाल बिल लाना चाहते है पर कांग्रेस, बीजेपी के साथ मिल कर उसकी राह में रोड़े अटका रही है।

सरकार चलाने में नाकाम होने के आरोप भी अरविंद केजरीवाल पर लगे पर वे हमेशा कहते रहे कि जन लोकपाल बिल का विधानसभा में ना पेश हो पाना ही उनके इस्तीफे की असली वजह रही। जनलोकपाल पर हजारों सरकारें कुर्बान करने की बात किया करते थे केजरीवाल। एक न्यूज़ चैनल को दिये गये इंटरव्यू में जब जन लोकपाल के मुद्दे के गायब हो जाने के मसले पर सवाल पूछा गया तो केजरीवाल साहब ने बड़ा ही गोल मोल उत्तर दिया। उनका कहना था कि भष्ट्राचार को खत्म करना उनके एजेंडे पर है और जन लोकपाल उसी एजेंडे का एक हिस्सा भर है। ये वही केजरीवाल है और ये वही आम आदमी पार्टी है जो भष्ट्राचार के खात्में के लिए बस जन लोकपाल ही चाहते थे। किसी और तरीके या कानून से भ्रष्टाचार खत्म किया जा सकता है इसे अरविंद केजरीवाल मानने को तैयार नही थे। यू-टर्न पॉलटिक्स के लिए पहले ही अरविंद केजरीवाल काफी मशहूर है पर जन लोकपाल के मुद्दे पर यू-टर्न समझ से परे है।

दूसरा आम आदमी पार्टी नेताओं ने दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल और बीजेपी के जगदीश मुखी की तुलना करने की कोशिश की। ये बड़ी ही हास्यप्रद कोशिश थी। एक तरफ तो अरविंद कह रहे है कि उन्हें यही नही पता कि उनकी पार्टी उन्हें किस सीट से टिकट देगी। पर दूसरी पार्टी से मुख्यमंत्री  कौन होगा ये उन्हें पता हैं। जबकि भाजपा ये पहले ही साफ कर चुकी है कि वो सामुहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। वजह भी साफ है भाजपा महाराष्ट्र और हरियाणा का जीत वाला मॉडल लागू करना चाहती है। भाजपा की और से डॉ हर्षवर्धन, सतीश उपाध्याय, मीनाक्षी लेखी और यहां तक कि किरण बेदी भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल बताये जा रहे हैं। पर अरविंद की दिलचस्पी मुखी में ज्यादा है। तुलना के पीछे की वजह भी जान ले। दरअसल वो एक जीती हुई लड़ाई लड़ना चाहते हैं। मोदी या हर्षवर्धन से तुलना होने पर अरविंद के चुनाव हारने की सम्भावना ज्यादा होगी। पर मुखी को वो एक कमजोर कैडिडेट मानते है। और कमजोर के साथ ही लड़ना चाहते है। ये एक विशुद्ध राजनितिक पैंतरा है, इसका क्लीन पॉलटिक्स से कुछ लेना देना नही।

पिछले लोकसभा में आम आदमी पार्टी ने अपने दम पर चुनाव लड़ा। देश भर में दिल्ली की सफलता दोहराना चाहती थी आम आदमी पार्टी। यहां तक कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का रथ रोकने दिल्ली से बनारस जा पहुंचे गए थे केजरीवाल। पर परिणाम क्या आये, आम आदमी पार्टी के 96% उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। जहां आम आदमी पार्टी की सरकार हुआ करती थी उस दिल्ली से एक भी सांसद नही जीत पाया। चुनावों से पहले प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले अरविंद केजरीवाल खुद लाखो वोटों से चुनाव हार गए। लोकसभा चुनावों ने पार्टी को उसकी ताकत का अहसास करा दिया। संसदीय चुनावों के बाद पार्टी इस कदर सहम गई कि हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया। जबकि हरियाणा में एक सर्वे के दौरान आम आदमी पार्टी कार्यकर्त्ताओं ने चुनाव लड़ने के पक्ष में फैसला दिया था।

एक तरह से मोदी से हार के डर को आम आदमी पार्टी ने स्वीकार कर लिया है। केजरीवाल की जगदीश मुखी से की गई तुलना मोदी से डर का हिस्सा लगती है। तो फिर आम आदमी पार्टी के पास आखिर रास्ते क्या बचे है। राष्ट्रीय स्तर पर वे अपनी ताकत को आजमा कर देख चुके हैं। मोदी की वजह से दिल्ली में दोबारा सत्ता हाथों से फिसलती लग रही है। और अगर दिल्ली भी हारे तो पॉलटिक्स फिर से शुरू करनी पड़ेगी। जो उफान उन्हें दिल्ली की जनता ने दिया था आम आदमी पार्टी उसे बनाये रखना चाहती हैं।

पर ये इतना आसान नही। और हां मोदी की जगह मुखी का नाम लेने जैसी बचकाना हरकतों से तो कतई मुमकिन नही। फिर आखिर करें तो करें क्या। दरअसल सवाल भाजपा या आप की जीत या हार का नही है। सवाल यहां मोदी, हर्षवर्धन, मुखी या केजरीवाल का भी नही हैं। सवाल है आम आदमी पार्टी की खोई हुई साख का। पार्टी को कुछ बातें समझनी होगी। आप एक बहुत बड़े जनआंदोलन से उभरी थी। एक ज्वार था जो वोटों के रूप में आम आदमी पार्टी पर बरसा। लोग बदलाव चाहते थे। पर अब वो कोई भी कारण मौजूद नही है। ऊपर से अरविंद की छवि एक ज्यादा बोलने वाले और काम से भागने वाले नेता की बन गई है। मोदी के उभार ने भी राजनीती की दशा बदल दी हैं। ऐसे में पुराने तरीकों को छोड़ आम आदमी पार्टी को जमीन से जुड़े मुद्दे उठाने होगें। जैसे आप ने दिल्ली के बाद देश जीतने का सपना देखा था। वैसे ही इस बार हारे या जीते आम आदमी पार्टी को दिल्ली के बाद दिल्ली नगर निगम यानि एम सी डी के चुनावों में उतरना चाहिए। जमीन से जुड़ी राजनीती की शुरूआत करनी चाहिए। अपने को साबित करना चाहिए। तभी पार्टी को अपनी साख वापस मिलेगी। जमीन से जुड़ाव ही पार्टी को जिंदा रखेगा।    

Sunday, November 2, 2014

विशाखापत्तनम्- जीत ली हुदहुद तूफान से जंग

तूफान अक्सर गुजर जाया करते हैं, पर हुदहुद घंटों तक विशाखापत्तनम् को झकझोरता रहा। फाइटर प्लेन जैसी आवाज़ वाली हवायें दिल में डर पैदा कर रही थीं। टीन की चादरें अनगाईडेड मिसाईलों की तरह जहां तहां हमले के लिए निकल पड़ीं। खिड़कियों और दरवाजों में लगे कांच हवा की मार सह ना सके और धमाकों के साथ टूट कर बिखर गए। आसमान काला पड़ गया। हवा ने जो कचरा आसमान में पहुंचा दिया था वो गोलियों की तरह विशाखापत्तनम् पर बरसता रहा। जिस पेड़ ने भी हवाओं का रास्ता रोकना चाहा उसको हवाओं ने जमीन पर ला पटका। जो पेड़ बचे भी वो भी अधमरी हालात में, पत्तियां तक नौच डाली हुदहुद ने। तूफान के बीच एक वक्त ऐसा भी आया जब हवाऐं थम गई। सूरज निकल आया। पर ये भी हुदहुद की चाल भर थी क्योंकि ये वो वक्त था जब तूफान की आंख यानि तूफान के सेंटर ने विशाखापत्तनम् को छुआ था। आने वाले चंद घंटे और भयानक साबित हुए।


विनाश की तस्वीरें 










हवायें थमने के बाद डरे सहमें लोगों ने जब घरों से बाहर झांका। तो हर तरफ बिखरे मलबे ने उनके कदमों को रोक दिया। कार मोटरसाईकिल तो क्या पैदल तक नही चला जा सकता था। चारो तरफ उखड़े पड़े विशाल पेड़ों ने रास्ते जाम कर दिये। मेन रोड ही नही गलियों तक में पहुंच मुश्किल थी। ज्यादातर मोबाईल टॉवर भी ध्वस्त हो चुके थे। लोग अपने ही घरों में फंस कर रह गए। एक तरह से हुदहुद ने विशाखापत्तनम् के 17 लाख लोगों को हाऊस अरेस्ट की सजा सुना दी। आंध्र प्रदेश में 46 जिंदगियां लील गया था हुदहुद। 70 हजार करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान हैं। जब सभी हुदहुद की कैद से आजाद होने को झटपटा रहे थे। तब रिलायंस JIO के हेड कंसट्रक्शन मि. राव ने पास के शहर काकीनाडा से पांच पैट्रोल से चलने वाली आरा मशीने मंगाने की पहल की। काकीनाडा में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की ऑफशोर फैसिलिटी है इसलिए तुरंत एक्शन हुआ और अगले दिन यानि 14 अक्तूबर को आरा मशीनें विशाखापत्तनम् पहुंच गई।



रिलायंस के स्थानीय कर्मचारियों का एक दल बनाया गया और ये वालियंटरस तुरंत काम में जुट गए। ज्यादातर के पास इस तरह की आरा मशीनों को चलाने का कोई अनुभव नही था। ये मशीनें इतनी ताकतवर है कि पलक झपकते ही बड़े से बड़े पेड़ के टुकड़े कर डालती हैं। पर रिलायंस वालियंटरस के लिए अपनी जान से ज्यादा जरूरी था कम्यूनिकेशन का पहला साधन यानि सड़क खोलना। चूंकि रिलायंस JIO कम्यूनिकेशन के फील्ड में सबसे तेज़ 4G डाटा सर्विस देने की तैयारी कर रहा है इसलिए रिलायंस के ये वालियंटरस जानते थे कि कम्यूनिकेशन कितना महत्वपूर्ण हैं।

प्रो. जी एस एन राजू, वाईस चांसरल आंध्रा यूनिवर्सिटी
जल्द ही ये खबर शहर में फैल गई कि रिलयंस अपनी विशेष आरा मशीनों से शहर की सफाई में जुटा है। आंध्रा यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर प्रो. जी एस एन राजू भी उनमें से एक थे। यूनिवर्सिटी कैम्पस की हालत तो और भी खस्ता थी। 50 हजार से ज्यादा पेड़ जमीन सूंध रहे थे। सैकड़ों गिरे पेड़ों ने कैम्पस की सड़को को बंद कर रखा था। हुदहुद ने आंध्रा यूनिवर्सिटी को एक खुले कबाड़गाह में तब्दील कर दिया था। पहले दो दिन तो पैदल भी यूनिवर्सिटी गेट तक नही पहुंचा जा सकता था। शहर की बिजली बंद थी। इसलिए कैम्पस में मौजूद एकमात्र आरा मशीन जो बिजली से चलती थी बेकार पड़ी थी। प्रो. राजू ने 15 अक्तूबर को रिलायंस से मदद मांगी और 16 अक्तूबर को रिलायंस के वालियंटर अपनी 5 आरा मशीनों के साथ कैम्पस की सफाई के लिए मौजूद थे। पेड़ हटने से रास्ता बना तो JCB और ट्रक भी अंदर आ पाये और काम ने तेजी पकड़ी। रिलायंस की इस नई सोच ने हमें भी प्रेरित किया इसलिए ही हम इतनी जल्दी कैम्पस खोल पायें यूनिवर्सिटी रजिस्टरार प्रो के आर एम राव ने बड़े खुले दिल से ये बात कही।
 


GVMC कमीशनर कु. जानकी को पॉवर आरा मशीनें सौपीं गई
रिलायंस द्वारा मंगाई गई मशीने इतनी कारगार साबित हो रही थी कि लोकल प्रशासन ने भी रिलायंस से मदद की गुहार लगाई। सड़कों पर रूकावट होने की वजह से जरूरी सामान की किल्लत हो गई। दूध, सब्जियां, खाने पीने की चीजें, पैट्रोल कुछ भी विशाखापत्तनम् नही पहुंच पा रहा था। स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए रिलायंस ने तुंरत 100 आरा मशीनों का ऑर्डर दे दिया। 24 घंटों से भी कम समय में ना केवल नई मशीने खरीदी गई, उन्हें विशाखापत्तनम् तक पहुंचाया गया। बल्कि उन्हें विशाखापत्तनम् की म्यूनिसिपल कमीशनर को सौंप भी दिया गया। हम जिंदगी की अहमियत समझते है इसीलिए ये काम हम इतनी तेजी से कर सके। ये कहते हुए रिलायंस के हेड कंसट्रक्शन मि. राव की आंखों में चमक आ गई।

उधर विशाखापत्तनम् के चिड़ियाघर में हालात बहुत बुरे बने हुए थे। 600 एकड़ में फैला है ये विशाल चिड़ियाघर। जानवरों के कुछ बाड़े बिलकुल तबाह हो गए। बटरफ्लाई ग्रीन हाऊस में एक भी तितली जिंदा नही बची। हुदहुद तूफान की तेज हवाओं और बारिश को वो झेल ना सकीं। दलपति (हिप्पो) के बाड़े की दीवार ढ़ह गई। चार जहरीले पॉयथन भी मौका देखकर भाग निकले। पर सबसे बड़ी मुश्किल आ रही थी जानवरों तक खाना पहुंचाने की। गूंगे जानवर बस शोर मचा सकते थे और आदमी उन से भी ज्यादा असहाय था। हजारों पेड़ जो पड़े थे,
गनपति (हिप्पो) खाना खा कर खुश है।
जानवरों और ज़ू कर्मचारियों के बीच। अन्य संस्थानों की तरह ज़ू के केयरटेकर की सहायता की अपील भी रिलायंस ठुकरा ना सका और करीब 8 आरा मशीनें ज़ू कर्मचारियों को सुपुर्द कर दी गई। ज़ू की पूरी तरह सफाई में तो अभी महीनों लगेगें पर राहत की बात यह है कि सभी बेजुबानों को वक्त पर खाना मिल रहा है।
  
हुदहुद के हमले से विशाखापत्तनम् कुछ देर के लिए डर जरूर गया था। पर उसने मोर्चा नही छोड़ा। शहर ने जीने का हौंसला बनाये रखा। सरकार की मदद से जल्द ही स्तिथियों पर काबू कर लिया गया। सड़कों को साफ कर दिया गया। पीड़ितों को रसद मिली। बिजली दोबारा चालू हुई। बाजार खुल गए, जरूरी सामान मिलने लगा। पूरे शहर ने एक प्रशिक्षित कमांडो की तरह मुकाबला किया। यहां तक कि सरकार की एक अपील पर पूरे विशाखापत्तनम् में दीवाली पर एक पटाखा तक नही छोड़ा गया। क्योंकि सड़क किनारे पड़ी सूखी पत्तियां, टहनियां और पेड़ों में आग लग जाने का खतरा था।


इस तूफान में 20 लाख के करीब पेड़ों ने दम तोड़ दिया। अब सबसे बड़ी चुनौती है विशाखापत्तनम् को फिर से हरा भरा बनाना। सरकार 10 नवम्बर से इसके लिए अभियान चलायेगी। यूनिवर्सिटी ने भी 50 हजार नए पेड़ लगाने का फैसला लिया है। आईये हम भी प्रण ले कि पेड़ो को ना नुकसान पहुंचाएगें और जो नुकसान पहुचाने की कोशिश करेगा उसको रोकेंगे क्योंकि बिना पेड़ों के ये दुनिया बहुत डरावनी लगती है।