"चुपचाप रहो पर एक बड़ी लाठी हमेशा अपने पास रखो" दुनिया के बड़े ताकतवर देशों की विदेश नीति लगभग इसी के इर्दगिर्द घूमती है .... यानी खुद कम बोलो लाठी को बोलने दो .... खुद कभी बोलो भी तो दुनिया की तरक्की, शांति और सौहर्द की ही बात करो ..... बाकि का काम लाठी खुद कर लेगी ... पाकिस्तान के मामले में भारत की भी यही पॉलिसी थी।
एक और विदेश नीति है जिसका झंडाबरदार अमेरिका रहा है .... पहले एक कहानी बनाओ .. फिर दुनिया को सुनाओ ..... बिना सबूत दुनिया को मानने पर मजबूर करो ... और अंत में अपनी लाठी लेकर चढाई कर दो .... ईराक में उसने ... वेपन ऑफ मॉस डिस्ट्रक्शन ... की कैसी झूठी कहानी बनाई थी ... ये किसी से झुपा नही है।
मैं इन दो तरह की विदेश नीतियों का जिक्र इस लिए कर रहा हूं कि आजकल पता ही नही चल रहा कि हमारी यानि भारत की विदेश नीति किस दिशा मेें जा रही है .... खासकर पाकिस्तान के मामले में ... लाठी तो अभी भी हमारे पास है ... खूब तेल पिलाई हुई.... और अपन चला भी खूब रहे है ... पर एक बदलाव आया है ... अब हम खूब जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर लाठी घूमा रहे है .....
बर्मा में आंतकवादियों के खिलाफ सेना ने ऑपरेशन क्या किया ... अखबारों में तस्वीरे छपवा दी ....ईशारों में राज्यमंत्री बोले संभल जाए पाकिस्तान .... कभी रक्षा मंत्री पाकिस्तान को धमकाने लगते है .... पाकिस्तान भी पूरा जोर लगा कर रोना शुरू कर देता है .... पाकिस्तान का रोना जो ना कर पाया था ..... हमारी चीख चिल्लाहट के साथ लाठी घूमाने ने वो कर दिखाया ....... दुनिया का ध्यान इस और खिंच रहा है ....
पाकिस्तान पर दवाब बनाना चाहिए इससे कोई इंकार नही ..... वो कई स्तर पर होना चाहिए .... इस से भी इंकार नही ... ईंट का जवाब पत्थर से दें .... कौन मना करता है ... पर इन पर छाती ठोकना ... विदेश नीति का हिस्सा नही हो सकता ....
वाजपेयी जी ने ठीक कहा था कि दोस्त बदले जा सकते है पड़ोसी नही ...20 करोड़ की आबादी वाला पाकिसतान कहीं नही जाने वाला ... हमें साथ रहना है ... यही सच्चाई है ....हमने बांगलादेश की तरक्की के रास्ते तैयार करने की कोशिशे शुरू कर दी हैं ...... इसी तरह हमें तमाम दुश्मनियों के बाद भी पाकिस्तान की तरक्की में मददगार होना होगा...... क्योंकि पाकिस्तान की तरक्की में ही साउथ एशिया की शांति छुपी है