18 सितम्बर 2014,
शाम 5 बजे। बाढ़ग्रस्त श्रीनगर का बेमीना इलाका। सड़क किनारे कारों की कब्रगाह सी
बनी है। सैकड़ों कारें पानी में अभी भी डूबीं हैं। बाढ़ का पानी कुछ कम जरूर हुआ, पर
अभी भी जानलेवा स्तर पर है। पानी उतरने के बाद मकानों पर खिंची मटमली सी लकीरें
बताती है की पानी का कहर कहां कहां तक बरपा था। रात होने को है, पर मुख्य सड़क पर
लोगों के झुंड के झुंड खड़ें हैं। उनके यूं इकट्ठा होने में एक पैटर्न साफ तौर पर
दिखाई देता है। लोगों के ये झुंड गलियों के मुहाने पर भीड़ लगाये खड़े हैं। दरअसल
ये वे बदनसीब लोग है जिनके घर उन गलियों में हैं, जो बाढ़ के पानी से लबालब भरीं
हैं। खड़ा पानी सड़ने लगा है, पर इस भारी बदबू के बीच भी नाक ढ़ापे हजारों लोग
अपने घरों को लौटने का इंतजार कर रहे हैं।
धुंधलका बढ़ने लगा
है, गली में कहीं दूर टार्च की रोशनी चमकती है और कई मुरझाये चेहरों से फिसलकर
दूसरी तरफ चली जाती है। कोई कश्मीरी में कुछ बोलता है। तभी नाव जैसी कोई चीज दिखाई
देती है। इसे नाव बस इस लिए कहा जा सकता है क्योंकि ये अभी तक पानी में डूबी नही।
तभी किसी ने मुझसे कुछ पूछा। कहां से आये हो आप। मुंबई, मैनें बात ना बढ़ाने की
गर्ज से छोटा सा जवाब दिया। अब क्यों आये हो। इस अकेले सवाल में कई तरह के भाव थे।
उलाहना भी था, अपनापन भी और गुस्सा भी। मैं ठीक से समझ नही पाया। कोई 22-24 साल का
नौजवान था। कई दिनों तक पानी में फँसे रहने के बाद कुछ दिन पहले ही निकल पाया था।
उसने नाव जैसी चीज को दिखाते हुए कर्कश आवाज में कहा, वो देख रहे हैं आप ये किसी
सरकार ने नही भेजी, ये हमने अपने हाथों से तैयार कर की है। और जितनी भी नावें आप
देख रहे है, जो गलियों से लोगों को निकाल रहीं हैं वो सब हमने ही अपनी कोशिशों से
बनायी है। वाकई एक नाव को छोड़ सारी की सारी नावें हर उस चीज से बनाई गई थी जो तैर
सकती थी।
बातों ही बातों में
उस नौजवान ने अपना नाम शाहिद बताया। वो अभी किसी कॉलेज से डिग्री लेने की कोशिश कर
रहा था। मेरे बताने पर की मैं रिलायंस फाउंडेशन की टीम के साथ आया हूं और फाउंडेशन
स्वास्थय सम्बंधी मदद पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। महामारी ना फैले इसके लिए भी
कई कदम उठाये जा रहे हैं। पीड़ितों को दवाईयां पहुंचाई जा रही हैं। तो वो कुछ नरम
पड़ा और बोला- ये बाढ़ अल्लाह का कहर है। पर तुरंत ही उसकी आवाज में पहले जैसा
पैनापन आ गया। कोई नही आया हमें बचाने। आर्मी आई पर केवल इंडियन टूरिस्टो को
बचाने, कश्मीरियों को बचाने कोई नही आया। हमें किसी से उम्मीद भी नही है, ना जेएंडके
सरकार से ना ही इंडिया से। उसने यह बात कुछ इस लहजे से कही जिसमें परायापन साफ झलक
रहा था। पर वो अपनी धुन में बोलता ही चला गया। जब इन सरकारों के बस में कुछ नही था
तो पाकिस्तान को बोल देते उसने भी तो मदद को कहा था। चाईना ने भी इंडिया को कहा था
कि हमें कश्मीर में आने दो हमारे पास वो तकनीक है। जिससे 48 घंटे में पूरे शहर का
पानी निकाल देगें पर इंडिया ने नही आने दिया। पर उनको क्या, झेल तो कश्मीरी रहा है
ना। दो हफ्ते बीत गये आज तक पानी नही निकला साहब, पूरे इलाके में एक पंप तक नही
लगा। मरे हुए जानवर भी अभी तक पानी में तैर रहे हैं, उनको उठाने तक की भी फुर्सत
नही है इनके पास। सच भी था कुछ देर पहले ही हम मिलिट्री कैटल शेड में मरे जानवरों
की लाशे देख कर आये थे।
क़मरवारी सड़क से
होटल लौटते वक्त झेलम नदी से सामना हुआ वही झेलम जिसने ‘धरती की जन्नत’ का
चेहरा ही बिगाड़ दिया। वो अपनी ही गति से बह रही थी। खतरे के निशान से नीचे। पर
झेलम के ऊपर बने पुल से गुजरते वक्त एक खतरा मैं बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा था।
और वो था अविश्वास का। कश्मीरियों के विश्वास को जीतने का सुनहरा मौका गवायां जा
चुका था। मुंबई के अखबारों में श्रीनगर में बाढ़ की खबरे पढ़ते और आर्मी के जवानों
की आवाम को बचाने वाली फोटो देख कर लगता था कि भारत ने और खासकर सेना अपने कश्मीरी
भाईयों का दिल जीत लिया है। पर केवल शाहिद ने ही मुझे हिला कर रख दिया। “इंडिया वापस जाओ” के कुछ
बैनर सोशल मीडिया पर जरूर देखे थे। पर तब सोशल मीडिया और मेन स्ट्रीम मीडिया पर
सेना के जवानों के कारनामों को इस तरह पेश किया जा रहा था। जिसमें शाहिद सहित सभी
कश्मीरी पीछे छूट गये। सेना का बचाव कार्य बड़ा हो गया और कश्मीरी आधी अधूरी राहत
के साथ बौना हो गया।
श्रीनगर की बाढ़ के
भयानक चेहरे का जो हिस्सा हम दिल्ली, मुंबई या देश के अन्य हिस्सों से देखते है वो
कश्मीर में कश्मीरियों के लिए इतना अलग क्यों हो जाता हैं। एक बात जो मुझे सबसे
ज्यादा परेशान कर रही थी, वो थी शाहिद की चाईना की प्रस्तावित मदद वाली बात। जोकि
सिरे से निराधार थी, अफवाह थी। पर ये अफवाहे आखिर कश्मीर में जगह कैसे बना लेती
है। इनको हवा कौन देता है। दूसरी तरफ देश के बाकी हिस्सो के सामने कश्मीर के बाढ़
पीड़तों की असलियत क्यों नही आ रही। अगर राहत में देरी हो रही है तो मेन स्ट्रीम
मीडिया उसे शिद्दत से क्यों नही उठा रहा।
दरअसल सोच में इस
गैप के दो कारण है। पहला लोकल प्रशासन यानि अब्दुल्ला सरकार और दूसरा राष्ट्रीय
मेन स्ट्रीम मीडिया। वैसे तो देश में बहुत सी ऐसी सरकारें है जिनसें लोग संतुष्ट
नही, पर उमर सरकार ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये। इतनी नाकामी जिसे बयां नही
किया जा सकता। श्रीनगर की सड़कों से गुजरते हुए सरकार की नामौजूदगी को आप महसूस कर
सकते है। लोग अपनी मदद स्वंय कर रहे हैं। कोई सरकार कहीं दिखाई नही देती। रिलिफ के
काम में कोई कॉरडिनेशन नही। जो NGO सरकार और आम
कश्मीरियों की मदद को आगे आयें हैं, उन्हें कहां कैंप लगाना है जिससे पीड़ितों तक
जल्दी पहुंचा जा सके, ऐसी बेसिक जानकारियां भी सरकार मुहैया नही करा पा रही।
नाकारेपन का आलम यह है कि देशभर से इकट्ठा कर कश्मीर भेजी जा रही मदद भी सही हाथों
में नही पहुंच पा रही। लोगों का गुस्सा सांतवे आसमान पर है वे अब कोई सरकारी इमदाद
नही चाहते। वो सरकार को सबक सिखाने के मूड में हैं। सरकार की इस नाकामी और
संवादहीनता की वजह से जो प्यार और सहायता पूरे देश से कश्मीर के वासियों के लिए आई
थी। वो ना तो सहायता ही उन तक पहुंच सकी और ना ही प्यार और सहानुभूति। क्योंकि
उसको पहुंचाने वाली सरकार कहीं थी ही नही। इसलिए देश के अन्य हिस्सों में लगता रहा
कि सब ठीक है जबकि कश्मीर में कुछ भी ठीक नही था।
दूसरी बड़ी वजह बना
मीडिया। ऐसे नाजुक वक्त में मीडिया से एक गंभीर भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती
हैं। पर मीडिया अपने रोल में पूरी तरह से फेल हो गई। मीडिया ने तीन बड़ी गलतियां की पहली गलती- सेना की जरूरत से ज्यादा
तारीफ। ऐसी किसी भी बाढ़ में हजारों लोगों तक मदद टाईम पर नही पहुंच पाती। विकसित
देश भी इसका अपवाद नही हैं। बहुत से लोग मदद ना मिलने पर निराशा और गुस्से का
शिकार हो जाते है। ऐसे में अगर मीडिया सेना की जरूरत से ज्यादा तारीफ करेगा तो
उल्टा ही पड़ेगा। और उसमें में भी तब जब आपसी अविश्वास का एक लम्बा इतिहास हो। दूसरी
गलती- वादी के अलगाव-वादी नेताओं को निशाना बनाना। सेना की तारीफ तक तो फिर भी ठीक
था। आप इसे अंधी देशभक्ति की श्रेणी में रख सकते हैं। पर जब सारा ध्यान बचाव में
लगना चाहिए तब TRP के दवाब में राजनितीक टिप्पणीयों ने कश्मीर का माहौल
और खराब कर दिया। यहां तक कि एक न्यूज चैनल ने तो बाढ़ को बहाना बना कुछ नेताओं को
अरेस्ट करने की कैंपेन तक शुरू कर दी। गलत रिपोर्टिंग तीसरी बड़ी गलती थी।
बाढ़ग्रस्त इलाकों की सही तस्वीर तक पेश नही कर पाये न्यूज चैनल। क्योंकि सारा
ध्यान तो सेना और अलगाववादी नेताओं की तरफ था। अपनी एक्सपर्टी का इस्तेमाल कर
मीडिया को लोकल प्रशासन की मदद करनी चाहिए थी पर ऐसा हो ना सका। और जाने अनजाने ही
सही मीडिया ने अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया।
इसमें कोई शक नही की
सेना ने वादी में अच्छा काम किया। इसमें भी कोई शक नही की कश्मीरियों को मदद देने पूरा
देश एकजुट हुआ। पर हमें इसे भी मानना होगा कि श्रीनगर में जो मदद की दरकार थी हमसब
उससे कोसो दूर रहे। ये वक्त निराशा का नही आत्मचिंतन का है। कहते है हर बुरे के साथ मौके भी दस्तक
देतें हैं। श्रीनगर में आई बाढ़ एक मौका था जब हम दिलों की दूरियों को कम कर सकते
थे। जब हम अविश्वास की गहरी खाई को पाट सकते थे। शाहिद का गुस्सा जायज है, वो यानी
कश्मीरी बस एक कदम की दूरी पर थे। पर हमने ये मौका गंवा दिया।