आतंक का लाईव टेलिकास्ट, होटल ताज की खिड़कियों से निकलते घने स्याह धुऐं के गुब्बार, कान फोड़ू गोलियों की आवाज़, हेलिकाप्टर से सेना के जवानों का उतरना और आतंकवादियों की टीवी पर लाईव बातचीत। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए इस हमले ने भारत की सुरक्षा के साथ साथ टीवी न्यूज़ की पोल भी खोल कर रख दी थी। सनसनी सनसनी और बस सनसनी, बेमलब के सवाल, बिना सोचे समझे लगातार लाईव प्रसारण, परिणामों का आंकलन तो दूर उस नाजुक वक्त में भी तथ्यहीन, गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग। यहां तक की TRP के दवाब में देश की सुरक्षा को भी ताक पर रख दिया गया।
वरिष्ठ पत्रकार वी जी वर्गीज ने हाल ही में देश के मीडिया पर कई सवाल उठाये है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के निरंकुश हो जाने को वे गंभीर खतरा मानतें हैं। हलांकि देश के कई बड़े टीवी न्यूज़ ग्रुप ने मिलकर अक्टूबर 2008 में ही NBA यानि न्यूज़ ब्रॉडकास्टर एशोसियेशन बना ली थी। जिसका मूल काम ही था टीवी न्यूज़ मीडिया की अनर्गल कवरेज़ पर लगाम कसना। पर कुछ दिनों बाद ही, ताज पर हमले के दौरान जब भारतीय मीडिया को कसौटी पर कसे जाने का वक्त आया तो वो बुरी तरह नाकाम रही। कई तरह के सवाल उठाये जाने लगे। कुछ ने मीडिया पर सरकारी शिकंजे की बात तक उठाई पर उसे नकार दिया गया।
पांच बरस से ज्यादा बीत गए, NBA की सदारत में टीवी न्यूज़ चैनलों को सेल्फ रेगुलेशन करते हुए, पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। शिवसेना सांसदों ने महाराष्ट्र भवन में खाने की क्वालिटी को लेकर वहां के एक कर्मचारी के साथ बदतमीजी की। गुण्डागर्दी की इस घटना को कुछ चैनलों ने साम्प्रदायिक रंग दे कर रिपोर्ट किया। तो कुछ ने ये साफ करना जरूरी नही समझा की ये सत्ता के नशे में मगरूर सांसदों का हंगामा था, ना कि कोई साम्प्रदायिक घटना। इससे ये बात साफ हो गई कि स्थितियों में कोई खास बदलाव नही हुए है। आखिर वो कौन सी वजह है जो भारतीय मीडिया को अपना चेहरा बदलने से रोकती है।
TRP – टी वी न्यूज़ इंडस्ट्री का सबसे अधिक नुकसान TRP ने किया है। TRP यानि टेलीविजन रेटिंग पॉइंट, इसे ही सफलता का पैमाना माना जाता है। TRP में नंबर एक बने रहने की आपाधापी में आज के अधिकतर एडिटर कंटेंट के साथ खिलवाड़ करने से भी नही चूकते। बाजार की शक्तियां और मैनेजमेंट उन्हें नंबर वन की दौड़ में बने रहने को मजबूर करती है। इस वजह से ज्यादा बिकाऊ माल या कहे स्टोरी ही न्यूज़ में दिखाई देती है। रचनात्मक, पॉजिटिव स्टोरिज का तो आकाल सा पड़ गया है। सनसनी फैलाओ और TRP पाओ के फॉर्मुले पर ही अधिकांश इंटस्ट्री काम कर रही है।
टीवी न्यूज़ को दूसरा बड़ा नुकसान हुआ है TRP मीटरों के अनुसार स्टोरी सिलेक्शन से। नंबर वन बने रहने की गला काट प्रतियोगिता में चैनल, जहां जहां TRP मीटर लगे हैं, बस उन्हीं खास इलाको के उपभोक्ताओं की खबरों को ही तरजीह देते है। यानि अगर आपके इलाके में TRP मीटर नही लगा तो खबर चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो टीवी न्यूज़ में उसे लेने की गुंजाईश न के बराबर है।
TRP के रंगीन चश्में से देश में TRP मीटर वाले इलाको को ही देखा जा सकता है। साथ ही आप सिर्फ सनसनीखेज़ और अप-मार्केट स्टोरिज को ही महसूस कर सकते है।TRP मीटर वाले 12000 घर ही यह तय करते है कि देश क्या देखेगा- क्या नही। उस पर भी तुर्रा ये कि टीवी न्यूज़ एडिटर, ये मानते है कि सनसनी सभी की पहली पंसद है। ऐसी सूरत में किसी भी न्यूज़ चैनल को देश का न्यूज़ चैनल कहना ठीक नही होगा।
TRP और बाजार के दवाब की वजह से समाज में टीवी न्यूज़ का लेवल इतना नीचे आ गया है कि उम्दा टैलेंट अब इधर रूख ही नही करता। न्यूज़ के माध्यम से कुछ बदलाव किए जा सकते है, ये अब दूर की कौड़ी लगता है। ऊपर से नए मीडिया कर्मियों को ट्रेंन करने वाले अच्छे मीडिया ट्रेनिंग स्कूलों की देश में भारी कमी है। हालात ये है कि सिर्फ 3 महीने का क्रैश कोर्स करा कर विद्यार्थियों को मीडिया में नौकरी के लिए तैयार घोषित कर दिया जाता है। आप विश्वास नही करेंगे, एक मीडिया स्कूल में, इंटरव्यू के दौरान भारत रत्न क्यों दिया जाता है जैसे साधारण सवाल के इतने अजीबो-गरीब जवाब आये कि बताने भर से भारत रत्न से सम्मानितों का अपमान हो सकता हैं।
एक और समस्या है न्यूज़ गैदरिंग के ढ़ाचे की। अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही रॉयटर, APTN जैसी कई न्यूज़ एजेंसिया काम कर रही है। पर देश में ANI नाम की न्यूज़ गैदरिंग एजेंसी के न्यूज़ रूम मे घुसपैठ के बाद से वहां कई बदलाव हुए। न्यूज़ अब डेस्क पर ही बनाई जाने लगी है, रिपोर्टर की अहमियत कम हुई है। सभी न्यूज़ चैनल का एक ही न्यूज़ सोर्स होने की वजह से खबरों की सूरत और सीरत एक जैसी दिखने लगी है। ऐसे में न्यूज़ डेस्क पर दवाब बनता है, कुछ नया सनसनीखेज़ करने का। और ज्यादातर डेस्क कर्मी ये दवाब झेल नही पाते और हथियार डाल देते है।
छोटे शहरो में न्यूज़ गैदरिंग के लिए चैनल, स्ट्रिंगर यानि कामचलाऊ रिपोर्टर पर निर्भर है। ये “रिपोर्ट के बदले पैसे” की व्यवस्था पर काम करते है। कैश क्रंच से जूझ रहे चैलन एक स्ट्रिंगर से महीने में औसतन एक-दो रिपोर्ट ही ले पाते है। ऊपर से पैसे भी समय पर नही देते। घर चलाने की जद्दोजहद में बहुत से स्ट्रिंगर ब्लैकमेलिंग के धंधे में कूद पड़े है। ले दे कर न्यूज़ गैदरिंग काम या तो हो नही रहा, हो रहा है तो बहुत ही सीमित तरीके से और उसमें भी ब्लैक मेलिंग का खतरा बना हुआ है। लगभग सभी न्यूज़ चैनल TRP के तिलिस्म में जकड़े हुए, बेअसर न्यूज़ गैदरिंग के ढ़ाचे को ढ़ोते और काम करने के घिसे पिटे तरीको में फंसे हुए है। उनसे “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”जैसे मौलिक अधिरकारो के बेजा इस्तेमाल पर बात करना फिजूल है।
वर्तमान में अधिकांश न्यूज़ चैनल, देश की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नही करते। देश की असली तस्वीर से कौसों दूर खड़े दिखाई देते है न्यूज़ चैनल। जरूरत है सेल्फ रेगुलेशन से आगे बढ़ कर एक नई पहल की। एक ऐसी पहल जो इंडस्ट्री को नये तरीके से सोचने पर मजबूर करे। देश में एक ऐसी न्यूज़ इंडस्ट्री या चैनल की कल्पना कीजिए जिसमें बाजार का खबरों के सिलेक्शन में कोई दख़ल ना हो। अनुभवी एंकर और रिपोर्टर हो। हर विषय पर तैयार एक उम्दा रिसर्च डिपार्टमेंट हो। कोने कोने से खबर इकट्ठा करने का एक मजबूत सिस्टम हो। खबर को शक्ल देने में माहिर तेज न्यूज़ डेस्क हो। और सबसे ऊपर देश हित और समाज हित में सोचने वाला, खबरो का पारखी एडिटर हो। तब कही जा कर इंडस्ट्री से जुड़े बड़े विषयों पर बात की जा सकती है। सिटिज़न जर्नालिज़म और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की सीमाओं पर चर्चा संभव हो सकती है। टीवी न्यूज़ इंडस्ट्री को एक बड़े बदलाव की जरूरत है और ये बदलाव इंडस्ट्री के भीतर से ही उभरना चाहिए तभी देश के चौथे स्तंभ को मजबूती मिलेगी।