Wednesday, July 30, 2014

TRP की धुन पर नाचता टीवी मीडिया


आतंक का लाईव टेलिकास्ट, होटल ताज की खिड़कियों से निकलते घने स्याह धुऐं के गुब्बार, कान फोड़ू गोलियों की आवाज़, हेलिकाप्टर से सेना के जवानों का उतरना और आतंकवादियों की टीवी पर लाईव बातचीत। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए इस हमले ने भारत की सुरक्षा के साथ साथ टीवी न्यूज़ की पोल भी खोल कर रख दी थी। सनसनी सनसनी और बस सनसनी, बेमलब के सवाल, बिना सोचे समझे लगातार लाईव प्रसारण, परिणामों का आंकलन तो दूर उस नाजुक वक्त में भी तथ्यहीन, गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग। यहां तक की TRP के दवाब में देश की सुरक्षा को भी ताक पर रख दिया गया।

वरिष्ठ पत्रकार वी जी वर्गीज ने हाल ही में देश के मीडिया पर कई सवाल उठाये है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के निरंकुश हो जाने को वे गंभीर खतरा मानतें हैं। हलांकि देश के कई बड़े टीवी न्यूज़ ग्रुप ने मिलकर अक्टूबर 2008 में ही NBA यानि न्यूज़ ब्रॉडकास्टर एशोसियेशन बना ली थी। जिसका मूल काम ही था टीवी न्यूज़ मीडिया की अनर्गल कवरेज़ पर लगाम कसना। पर कुछ दिनों बाद ही, ताज पर हमले के दौरान जब भारतीय मीडिया को कसौटी पर कसे जाने का वक्त आया तो वो बुरी तरह नाकाम रही। कई तरह के सवाल उठाये जाने लगे। कुछ ने मीडिया पर सरकारी शिकंजे की बात तक उठाई पर उसे नकार दिया गया।

पांच बरस से ज्यादा बीत गए, NBA की सदारत में टीवी न्यूज़ चैनलों को सेल्फ रेगुलेशन करते हुए, पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। शिवसेना सांसदों ने महाराष्ट्र भवन में खाने की क्वालिटी को लेकर वहां के एक कर्मचारी के साथ बदतमीजी की। गुण्डागर्दी की इस घटना को कुछ चैनलों ने साम्प्रदायिक रंग दे कर रिपोर्ट किया। तो कुछ ने ये साफ करना जरूरी नही समझा की ये सत्ता के नशे में मगरूर सांसदों का हंगामा था, ना कि कोई साम्प्रदायिक घटना। इससे ये बात साफ हो गई कि स्थितियों में कोई खास बदलाव नही हुए है। आखिर वो कौन सी वजह है जो भारतीय मीडिया को अपना चेहरा बदलने से रोकती है।

TRP – टी वी न्यूज़ इंडस्ट्री का सबसे अधिक नुकसान TRP ने किया है। TRP यानि टेलीविजन रेटिंग पॉइंट, इसे ही सफलता का पैमाना माना जाता है। TRP में नंबर एक बने रहने की आपाधापी में आज के अधिकतर एडिटर कंटेंट के साथ खिलवाड़ करने से भी नही चूकते। बाजार की शक्तियां और मैनेजमेंट उन्हें नंबर वन की दौड़ में बने रहने को मजबूर करती है। इस वजह से ज्यादा बिकाऊ माल या कहे स्टोरी ही न्यूज़ में दिखाई देती है। रचनात्मक, पॉजिटिव स्टोरिज का तो आकाल सा पड़ गया है। सनसनी फैलाओ और TRP पाओ के फॉर्मुले पर ही अधिकांश इंटस्ट्री काम कर रही है।

टीवी न्यूज़ को दूसरा बड़ा नुकसान हुआ है TRP मीटरों के अनुसार स्टोरी सिलेक्शन से। नंबर वन बने रहने की गला काट प्रतियोगिता में चैनल, जहां जहां TRP मीटर लगे हैं, बस उन्हीं खास इलाको के उपभोक्ताओं की खबरों को ही तरजीह देते है।  यानि अगर आपके इलाके में TRP मीटर नही लगा तो खबर चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो टीवी न्यूज़ में उसे लेने की गुंजाईश न के बराबर है।

TRP के रंगीन चश्में से देश में TRP मीटर वाले इलाको को ही देखा जा सकता है। साथ ही आप सिर्फ सनसनीखेज़ और अप-मार्केट स्टोरिज को ही महसूस कर सकते है।TRP मीटर वाले 12000 घर ही यह तय करते है कि देश क्या देखेगा- क्या नही। उस पर भी तुर्रा ये कि टीवी न्यूज़ एडिटर, ये मानते है कि सनसनी सभी की पहली पंसद है। ऐसी सूरत में किसी भी न्यूज़ चैनल को देश का न्यूज़ चैनल कहना ठीक नही होगा।
  
TRP और बाजार के दवाब की वजह से समाज में टीवी न्यूज़ का लेवल इतना नीचे आ गया है कि उम्दा टैलेंट अब इधर रूख ही नही करता। न्यूज़ के माध्यम से कुछ बदलाव किए जा सकते है, ये अब दूर की कौड़ी लगता है। ऊपर से नए मीडिया कर्मियों को ट्रेंन करने वाले अच्छे मीडिया ट्रेनिंग स्कूलों की देश में भारी कमी है। हालात ये है कि सिर्फ 3 महीने का क्रैश कोर्स करा कर विद्यार्थियों को मीडिया में नौकरी के लिए तैयार घोषित कर दिया जाता है। आप विश्वास नही करेंगे, एक मीडिया स्कूल में, इंटरव्यू के दौरान भारत रत्न क्यों दिया जाता है जैसे साधारण सवाल के इतने अजीबो-गरीब जवाब आये कि बताने भर से भारत रत्न से सम्मानितों का अपमान हो सकता हैं।

एक और समस्या है न्यूज़ गैदरिंग के ढ़ाचे की। अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही रॉयटर, APTN जैसी कई न्यूज़ एजेंसिया काम कर रही है। पर देश में ANI नाम की न्यूज़ गैदरिंग एजेंसी के न्यूज़ रूम मे घुसपैठ के बाद से वहां कई बदलाव हुए। न्यूज़ अब डेस्क पर ही बनाई जाने लगी है, रिपोर्टर की अहमियत कम हुई है। सभी न्यूज़ चैनल का एक ही न्यूज़ सोर्स होने की वजह से खबरों की सूरत और सीरत एक जैसी दिखने लगी है। ऐसे में न्यूज़ डेस्क पर दवाब बनता है, कुछ नया सनसनीखेज़ करने का। और ज्यादातर डेस्क कर्मी ये दवाब झेल नही पाते और हथियार डाल देते है।

छोटे शहरो में न्यूज़ गैदरिंग के लिए चैनल, स्ट्रिंगर यानि कामचलाऊ रिपोर्टर पर निर्भर है। ये रिपोर्ट के बदले पैसे की व्यवस्था पर काम करते है। कैश क्रंच से जूझ रहे चैलन एक स्ट्रिंगर से महीने में औसतन एक-दो रिपोर्ट ही ले पाते है। ऊपर से पैसे भी समय पर नही देते। घर चलाने की जद्दोजहद में बहुत से स्ट्रिंगर ब्लैकमेलिंग के धंधे में कूद पड़े है। ले दे कर न्यूज़ गैदरिंग काम या तो हो नही रहा, हो रहा है तो बहुत ही सीमित तरीके से और उसमें भी ब्लैक मेलिंग का खतरा बना हुआ है। लगभग सभी न्यूज़ चैनल TRP के तिलिस्म में जकड़े हुए, बेअसर न्यूज़ गैदरिंग के ढ़ाचे को ढ़ोते और काम करने के घिसे पिटे तरीको में फंसे हुए है। उनसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताजैसे मौलिक अधिरकारो के बेजा इस्तेमाल पर बात करना फिजूल है।

वर्तमान में अधिकांश न्यूज़ चैनल, देश की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नही करते। देश की असली तस्वीर से कौसों दूर खड़े दिखाई देते है न्यूज़ चैनल। जरूरत है सेल्फ रेगुलेशन से आगे बढ़ कर एक नई पहल की। एक ऐसी पहल जो इंडस्ट्री को नये तरीके से सोचने पर मजबूर करे। देश में एक ऐसी न्यूज़ इंडस्ट्री या चैनल की कल्पना कीजिए जिसमें बाजार का खबरों के सिलेक्शन में कोई दख़ल ना हो। अनुभवी एंकर और रिपोर्टर हो। हर विषय पर तैयार एक उम्दा रिसर्च डिपार्टमेंट हो। कोने कोने से खबर इकट्ठा करने का एक मजबूत सिस्टम हो। खबर को शक्ल देने में माहिर तेज न्यूज़ डेस्क हो। और सबसे ऊपर देश हित और समाज हित में सोचने वाला, खबरो का पारखी एडिटर हो। तब कही जा कर इंडस्ट्री से जुड़े बड़े विषयों पर बात की जा सकती है। सिटिज़न जर्नालिज़म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं पर चर्चा संभव हो सकती है। टीवी न्यूज़ इंडस्ट्री को एक बड़े बदलाव की जरूरत है और ये बदलाव इंडस्ट्री के भीतर से ही उभरना चाहिए तभी देश के चौथे स्तंभ को मजबूती मिलेगी। 

Tuesday, July 29, 2014

ऑडिटर का ऑडिट – CAG का सच


एक साल में 50 हजाह 738 यूनिट्स का ऑडिट। 47 हजार 595 इंसपेक्शन रिपोर्ट। 1793 ऑडिट ऑब्जरवेशंस। 198 परफॉरमेंस ऑडिट। परफॉरमेंस  ऑडिट पर 1516 सिफारिशें। फॉइनेंशियल एटेस्ट ऑडिट के तहत 5 हजार 551 एकाउंटस का सर्टिफिकेशन। विभिन्न सदनों में रखें जाने के लिए 138 ऑडिट रिपोर्ट। 46 हजार 936 कर्मचारी। और करीब 2 हजार 650 करोड़ का सालाना बजट। ये आकंड़े है 2012-13 के कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया यानि CAG के। तस्वीर बड़ी जबर्दस्त लगती है और उससे भी जबर्दस्त है आम जनता के बीच CAG की छवि।  
 
अब जरा दूसरी तस्वीर भी देख ले। उसी वर्ष CAG ने ऑडिट कर सरकारी खजाने में 2.5 लाख करोड़ से भी ज्यादा का नुकसान बताया। जिसमें से सरकारों ने करीब सवा दो लाख करोड़ को नुकसान माननें से ही इंकार कर दिया। और उसमें से भी केवल 5 हजार 537 करोड़ रूपये ही वापस मिल सके यानि CAG ने जो नुकसान देश को बताया, उसमें से केवल 2.2% ही वापस मिल सका। परफॉरमेंस ऑडिट पर CAG की 30%  से भी कम सिफारिशों को सरकारों ने काम लायक माना। केंद्र सरकार ने CAG द्वारा दी गई 175 ऑब्सरवेशंस में से केवल 18 को ही पूरी तरह स्वीकार किया। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि CAG की केंद्र सरकार को दी गई सिफारिशें PAC यानि पार्लियामेंट अफेयरस कमेटी के पास स्वीकार होने जाती हैं। जिसमें अलग अलग दलों के सांसद CAG की सिफारिशों पर फैसले लेते हैं। दूसरी और CAG में ऑडिटरस की एक तिहाई सीटें खाली पड़ी है। 25 हजार 388 कर्मचारी ही सीधे तौर पर हजारों रिपोर्ट और ऑडिट रिपोर्ट तैयार करते है।

ये आंकड़े कुछ अलग ही तस्वीर बताते हैं। एक ऐसी वैधानिक संस्था की जो पूरी तरह अपनी जिम्मेदारियां पर खरी नही उतर रही। कर्मचारियों की कमी से जूझ रही, इस संस्था से गहरी छानबीन की उम्मीद नही की जा सकती। इसकी झलक सरकारों के उन फैसलों से मिलती है, जो वे CAG की सिफारिशों के मद्देनजर लेतीं है। ये सरकारें विभिन्न दलों और विचारधाराओं वाली राज्य और केंद्र सरकारे है। इतनी सिफारिशों को अलग अलग सरकारों द्वारा नकारा जाना, CAG की कार्यकुशलता पर सवाल उठाता है। पर सवाल CAG की कार्यकुशलता या उसके फैसलों का नही, सवाल ये है कि CAG ये फैसले आखिर लेता कैसे है। क्या वो बिंदु है जिन को फैसले लेते वक्त CAG को ध्यान रखना चाहिए। खास तौर पर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानि PPP के ऑडिट के वक्त। क्योंकि इस एरिया में लिया गया कोई भी फैसला देश में इंवेस्टमेंट के माहौल को प्रभावित कर सकता है। 

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानि PPP के ऑडिट के लिए International Organization of Supreme Audit Institutions (INTOSAI) की एक गाइडलाईन हैं। CAG भी इस संस्था का  सदस्य है। इस गाइडलाईंन के पैरा 4.4.2 में साफ कहा गया है कि PPP का ऑडिट करते वक्त ऑडिटर को अपनी सीमाएं समझनी चाहिए। ऑडिटर के पास उस खास क्षेत्र की जानकारी और अनुभव सीमित हो सकता है। साथ ही किसी भी प्रोजेक्ट के प्रोसेस और रिजल्ट को एग्जामिन करने लायक विशेषज्ञता की कमी भी हो सकती है। पैरा 4.4.3 में INTOSAI ने साफ किया है कि CAG जैसी संस्थाओं को केवल तकनीक सवालों के फेर में नही पड़ना चाहिए। ऐसे प्रोजेक्ट्स से मिलने वाले समाजिक और आर्थिक लाभों और उनसे उपजने वाले प्रभावो पर भी ध्यान देना चाहिए। इतनी सटीक गाइंडलाइंस के बावजूद CAG दो गुना दो चार के फेर में ही पड़ा हुआ हैं।

विभिन्न मामलों में दिए अपने फैसलों में CAG ने साफतौर पर इन गाइडलाइंस को दरकिनार कर दिया है। CAG के कामों का ऑडिट टेलिकॉम सेक्टर में दिए गये CAG के ही फैसलों की रोशनी में करना होगा। 2G घोटला हो या कोयला घोटाला इस में कोई दो मत नही की ये CAG की बदौलत ही पकड़ में आये। पर उनकी कीमतों को इस कदर बढ़ा चढ़ा कर बता दिया गया कि अच्छे अच्छों के गले नही उतरा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2G के 122 लाइसेंस कैसिंल करने बाद जब नवम्बर 2012 में दोबारा नीलामी हुई तो CDMA तकनीक के लिए तो कोई बोलीदाता ही नही मिला और GSM में जिन 18 सर्कलों में बोली लगी भी, उनमें से 17 सर्कल में रिजर्व प्राइस पर ही स्पैक्ट्रम नीलाम करने पड़े। दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों तक को ग्राहक नसीब नही हुआ। 2G मामलें में CAG ने नुकासन की जो ऑडिट रिपोर्ट दी थी वो बस कागज का पुलिंदा साबित हुई।

टेलिकॉम सेक्टर में ही रिलायंस जियो के बारे में दी गई CAG की एक और ऑबजरवेशन पर भी गौर फरमाइये। CAG कि ये रिपोर्ट, लीक हो कर न्यूज पेपर और टीवी तक पहुंची है। इस तथाकथित रिपोर्ट में सरकारी खजाने को 22 हजार 842 करोड़ की चपत की बात कही गई है।  इतनी बढ़ी रकम का घोटाला बता कर CAG ने एक बार फिर सबको सकते में डाल दिया। CAG के इस दावे कितना दम है आइयें देखते हैं।

2010 में 3G और BWA यानि 4G स्पैक्ट्रम की नीलामी प्रक्रिया शुरू हुई तो पूरे भारत के लिए 3G स्पैक्ट्रम की नीलामी के लिए 3500 करोड़ रूपये की रिजर्व कीमत रखी गई। बोली लगी 16700 करोड़ यानि लगभग 4.7 गुना ज्यादा। उधर 4G के लिए रिजर्व प्राइस रखा गया था 1750 करोड़ रूपये...... और बोली लगी तकरीबन 12847.77 करोड़ रूपये.... यह रिजर्व प्राइस से 7.3 गुना ज्यादा है ... यानि सरकार को 3G के मुकाबले 4G मे रिजर्व प्राइस से कई गुना ज्यादा कीमत मिली।

22842 करोड़ के नुकसान को साबित करने के लिए CAG का तर्क है कि अगर बोली से पहले ये पता होता कि BWA स्पैक्ट्रम पर भी वॉयस सर्विस दी जा सकती है तो उसकी कीमत भी 3G के बराबर ही होती। इससे एक बार फिर साबित हो गया कि CAG बिना गहराई से जाने ही अपनी सिफारिशें सामने रख रहा है। बोली के लिए जारी Notice Inviting  Applications  (NIA) और कुछ सवालों के जवाब में DoT ने ये साफ कहा था कि स्पैक्ट्रम और लाइसेंस दो अलग अलग चीजें है और इन्हें अलग अलग ही लेना होगा। मतलब साफ है कि स्पैक्ट्रम पर किसी किस्म की पाबंदी नही थी। वॉयस हो या डाटा, स्पैक्ट्रम दोनो सुविधाओं को देने के लिए स्वंतंत्र है। असल में केवल लाइसेंस के मुताबिक ही सर्विस देने की पांबदी थी। जिसके पास जैसा लाइसेंस, वो वैसी ही सुविधा दे सकता था। यानि ISP लाइसेंस वाले डाटा सर्विस और UAS लाइसेंस वाले वॉयस व डाटा दोनो सर्विस दे सकते थे। 2010 की 3G और BWA नीलामी की यह बुनियादी सच्चाई थी। लेकिन लगता है CAG ने सच को अनदेखा कर दिया।    

सवाल यह जरूर है कि सरकार ने BWA यानि 4G का रिजर्व प्राइस कम क्यों रखा। दरअसल 3G और 4G की तकनीकें बिलकुल अलग अलग है। 2010 में नीलामी के वक्त 3G एक जांची परखी तकनीक थी। इसकी technology भी दुनिया में खूब इस्तेमाल हो रही थी। इसके मुकाबले 4G का spectrum band यानि 2300 मेगा हर्ट्ज, 3G जितना efficient यानि कुशल स्पैक्ट्रम नही है। 2010 में इसकी technology विकास के दौर में थी। नीलामी के साल यानि 2010 तक पूरी दुनिया में सिर्फ एक जगह इस स्पैक्ट्रम पर व्यवसायिक या commercial सेवाएं उपलब्ध थी।

2010 तक विश्व में 3G के तकरीबन 100 करोड़ ग्राहक थे। जबकि 4G के सिर्फ 2 लाख 15 हजार के करीब। इसके अलावा कौन सी तकनीक का इस्तेमाल व्यवसायिक तौर पर किया जाना है, ये भी स्पष्ट नही था। Wimax & LTE नाम की दो अलग अलग तकनीकों पर विचार किया जा रहा था। जाहिर है कि नीलामी के समय 4G के बारे में कम्पनियां ज्यादा उत्साहित नही थी। फिर भी IBSPL जों अब रिलायंस JIO है, ने 12847.77 करोड़ रूपये का निवेश किया। इस स्पैक्ट्रम के लिए technology लाने और विकसित करने में अरबो रूपये का खर्च कम्पनी को अलग से करना पड़ा।

इन तथ्यों पर अगर CAG गौर करता तो तस्वीर साफ हो जाती। पर हुआ उल्टा CAG ने सभी तथ्यों को अनदेखा कर 3G की कीमत जानी और 4G की कीमतों का अनुमान पेश कर दिया। साथ ही 22842 करोड़ के नुकसान की घोषणा भी। जबकि तथ्य यह है कि BWA यानि 4G स्पैक्ट्रम में स्थापित कम्पनियां हाथ लगाने को तैयार नही थी। तब IBSPL जो अब रिलायंस JIO है, ने रिजर्व प्राइज से 7.3 गुना कीमत पर 4G स्पैक्ट्रम खरीदा।   

CAG ने सिर्फ रिलायंस के मामले में गच्चा खाया हो ऐसा नही है। औद्योग जगत में CAG के कई फैसलों को लेकर भारी नाराजगी है। CAG की इन अनर्गल सिफारिशों से निवेश का माहौल खराब होता है। ऐसे में भारत दुनिया का औद्योगिक नायक तभी बन सकता है जब सरकारें पूरी ताकत से पब्लिक और प्राइवेट कम्पनियों को एक स्वस्थ बाजार उपलब्ध करायें।

CAG एक संवैधानिक और बहुत ही महत्व की संस्था है। जन मानस में उसका सम्मान भी है। पर CAG को लोक लुभावनी सिफारिशों से बचना होगा। देश को हुए नुकसान को बढ़ा चढ़ा कर बताने के दंभ से परहेज करना होगा। PPP मॉडल का आडिट करते हुए अपनी सीमांए ध्यान में रखनी होगीं। दो गुना दो चार के फेर से बाहर निकल सामाजिक और अप्रत्य़क्ष आर्थिक प्रभावों को भी देखना होगा। ये CAG की जिम्मेदारी है कि वो देखे कि अधकचरी ऑडिट रिपोर्टों में उलझ कर कहीं देश मंदी की चपेट में ना आ जाये। देश को भष्ट्राचार के खात्मे की जितनी जरूरत है उतनी ही जरूरत विकास की भी है।

संजय पाण्डेय

13/07/2014